सखी आया ये बसंत
सखी आया ये बसंत
सखी आया रे बसंत
मन भाया रे बसंत
ठिठुर रहे थे हम सब अब तक
प्रचंड ठंड की बांहों में
धुंध ही धुंध की फैली अब तक
शहर गली हर गांव में
बहार बन छाया रे बसंत
सखि आया बसंत
प्रणय मिलन की बेला
कोई कैसे रहे अकेला
धरती का श्रृंगार देख
अंबर रह ना पाया
सखि आया रे बसंत
मन भाया रे बसंत
पीली पीली सरसों फूली
मंजरिया मुस्कुराने लगी
कुहूक- कुहूक अमवा की डाली
कोयल गीत सुनाने लगी
गुंजन करते भवंरे
तितलियां देख मंडराने लगी
देख देख कर फूलों को
कलियां भी शर्माने लगी
बन उमंगो का त्योहार
संग रंगों की बौछार लाया रे बसंत
सखी आया रे बसंत
मन भाया रे बसंत।
