सिलसिले यादों के
सिलसिले यादों के
ग़ज़ल
दिल में उसको यादों का सिलसिला है!
जिदगी से हो गया जो लापता है
गैर रक्खा है उसी ने खुद को मुझसे
रक्खा उसने कब मगर ये वास्ता है
नफ़रतों ने घेरा है ऐसा मुझे
प्यार का खोया यहां तो रास्ता है
कब बढ़ाएगा क़दम वो दोस्ती का
मेरा उससे तो अभी तक फ़ासला है
देखकर इनकार कर देता है रिश्ता
शक्ल से क्या वो यारों इतना बुरा है
देखता था आंखों में जिसकी वफ़ा
फेरकर चेहरा वही मुझसे चला है
बोलता वो बात कोई भी नहीं तो
आंख भरके वो आज़म को देखता है।
आज़म नैय्यर
सहारनपुर उत्तर प्रदेश
