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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract Inspirational

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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract Inspirational

श्रम के शिल्पी

श्रम के शिल्पी

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शिलाओं की खामोश कठोरता में,
जहाँ रवि की तप्त किरणें भी मुरझाएँ।
विराजते हैं वे देवता।
धरा का स्पर्श चरणों में, नयनों में तम है घिर जाए।

हथौड़ी है तीक्ष्ण कृपाण, तगारी है उनकी ढाल,
कुदाली से जूझते वे, है क्षुधा विकराल।

उनके स्वेद की धाराएँ प्रवाहित,
है कहां इतिहास में समाहित।
उनकी शिराओं से लेकिन प्रसूत होतीं
सभ्यता की दृढ़ गाथाएँ अमिट।

परिश्रम है उनकी अर्चना, जीवन है हवन कुंड,
आरती नहीं चाहते, है आकांक्षा छत की अखंड।
भाग्य विधाता की आकृतियाँ जो बनाएं,
भूख है पास उनके, नहीं है भूखंड।

नगर की जगमगाहट में विलीन होते
श्रम के शिल्पी
हैं अनाम, फिर भी अनश्वर।
प्रणाम उन्हें, जो पलकें मूंदे बिना,
गढ़ते हैं देवालयों में देवत्व निरन्तर!

इतिहास के पृष्ठों में रिक्त जो स्थल है,
काश, वहाँ अंकित हो जाए उनका श्रम अमर।


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