श्रीमद्भागवत -३०३ः भगवान की विभूतियों का वर्णन
श्रीमद्भागवत -३०३ः भगवान की विभूतियों का वर्णन
उद्धव जी ने कहा, हे भगवन
परब्रह्म हैं आप स्वयं ही
ना आपका कोई आदि है
ना आपका अंत है कोई ।
समस्त प्राणियों और पदार्थों की
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के
कारण भी आप ही हैं और
स्थित आप हैं सभी प्राणियों में ।
परंतु जिन लोगों ने अपने
नहीं किया है मन को वश में
वो मनुष्य किसी भी तरह
आपको जान नहीं सकते ।
बड़े बड़े ब्रह्म ऋषि, महा ऋषि
आपके जिन रूपों, विभूतियों की
उपासना कर सिद्धि प्राप्त करें
आप मुझसे कहिए सब वही ।
सब ऋषियों के अंतरात्मा आप हो
अपने को गुप्त रखकर लीला करें
आप सबको देखते हैं परंतु
प्राणी माया से मोहित ही रहें ।
आपको नहीं देख सकते वो
और आपके चरणकमल जो
सभी तीर्थों को तीर्थ बनाते
वंदन करता हूँ मैं उन्हें ।
पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल, दिशाओं में
विभूतियाँ जो आपके प्रभाव से
युक्त हैं उनका वर्णन अब
आप कृपा कर कीजिए मुझसे ।
श्री कृष्ण ने कहा , प्रिय उद्धव
कौरव पांडवों का युद्ध छिड़ा हुआ
जिस समय कुरुक्षेत्र में तब
अर्जुन ने मुझे यही प्रश्न किया था ।
धारणा हुई अर्जुन के मन में कि
कुटुम्बियों को राज्य के लिए मारना
बहुत निन्दनीय अधर्म है ये तो
साधारण पुरुष समान वो सोच रहा ।
सोचे कि मैं मरने वाला हूँ
और मरने वाले हैं ये सब भी
और उस धर्म युद्ध से
उपरत हो गया सोचकर यही ।
तब मैंने वीर अर्जुन को
बहुत सी युक्तियाँ देकर समझाया
जो तुम कर रहे, वही प्रश्न
अर्जुन ने मुझे उस समय किया था ।
समस्त प्राणियों की आत्मा
हितेषी, सुहृद और ईश्वर मैं हूँ
गति हूँ गतिशील पदार्थों में
अपने अधीन करें जो, उनमें काल हूँ ।
जितने भी गुणवान पदार्थ हैं
उनका स्वाभाविक गुण हूँ उनमें
सूक्ष्म वस्तुओं में मैं जीव हूँ
मन हूँ कठिनाई में वश में होने वालों में ।
वेदों का अभिव्यक्तिस्थान हिरणयगर्भ हूँ
ओंकार हूँ मैं मन्त्रों में
अक्षरों में अकार, छंदों में गायत्री
इन्द्र मैं समस्त देवताओं में ।
आठ वसुओं मैं मैं अग्नि
द्वादश आदित्यों में विष्णु मैं
एकादश रुद्रों में नीलरोहित रुद्र
ब्रह्मऋषियों में भृगु हूँ मैं ।
राजऋषियों में मनु हूँ
नारद हूँ में देवऋषियों में
गायों में कामधेनु गाय
कपिल मुनि सिद्धेषवरों में ।
पक्षियों में गरुड़, प्रजापतीयों में दक्ष
और पितरों में में अर्यमा
दैत्यों में दैत्यराज प्रह्लाद हूँ
नक्षत्रों में मैं चंद्रमा ।
औषधियों में सोमरस एवम्
यक्षराक्षसों में कुबेर हूँ
गजराजों में मैं एरावत
जलवासियों में वरुण, उनका प्रभु ।
तपते, चमकने वालों में सूर्य
राजा हूँ मैं इन मनुष्यों में
घोड़ों में मैं उच्च्श्रवा घोड़ा
सोना हूँ मैं सब धातुओं में ।
दण्डधारियों में यम हूँ मैं
और सर्पों में वासुकि
नागराजों में शेषणाग हूँ
सींग, दाढ़ वाले प्राणियों में सिंह ।
आश्रमों में सन्यास आश्रम
और वर्णों में हूँ ब्राह्मण मैं
तीर्थों और नदियों में गंगा
जलाशयों में हूँ समुंदर मैं ।
अस्त्र शस्त्रों में धनुष तथा
शंकर त्रिपुरारी धनुर्धरों में
निवास स्थानों में सुमेरु
हिमालय मैं दुर्गम स्थानों में ।
वनस्पतियों में पीपल और
जो हूँ मैं धान्यों में
मैं पुरोहितों में विशिष्ठ हूँ
और वृहस्पति वेद वेताओं में ।
समस्त सेनापतियों में कार्तिकेय
सन्मार्गप्रवर्तकों में ब्रह्मा हूँ
पंच महायज्ञों में ब्रह्मयज्ञ
व्रतों में मैं अहिंसाव्रत हूँ ।
शुद्ध करने वाले पदार्थों में वायु,
अग्नि, सूर्य, जल, वाणी, आत्मा मैं
मनोनिरोध रूप समाधि हूँ
आठ प्रकार के योगों में मैं ।
विजय के इच्छुकों में रहने वाला नीति बल
स्त्रियों में मनु पत्नी शतरूपा हूँ
पुरुषों में स्वयंभू मनु मैं
मुनिश्वरों में नारायण मैं हूँ ।
सनतकुमार हूँ ब्रह्मचारियों में
कर्मसन्यास मैं कर्मों में
आत्मस्वरूप का अनुसंधान हूँ
मैं साधनों में अभय के ।
अभिप्रायगोपन के साधनों में
मधुर बचन एवं मौन मैं
स्त्री पुरुष के जोड़ों में प्रजापति जिससे
पहले स्त्री पुरुष पैदा हुए हैं ।
सदा सावधान रह जागने वालों में
सवंतसररूप काल मैं हूँ
ऋतुओं में वसंत, महीनों में मार्गशीर्ष
और नक्षत्रों में अभिजीत मैं ।
युगों में मैं सतयुग हूँ
महर्षि देवन और अमित विवेकियों में
व्यासों में कृष्णद्वेपायानव्यास तथा
मनस्वी शुक्राचार्य कवियों में ।
सृष्टि की उत्पत्ति और लय
जन्म और मृत्यु प्राणियों की
तथा जान ने वाले विद्या अविद्या को
भगवानों में मैं वासुदेव ही ।
मेरे प्रेमी भक्तों में तुम उद्धव
किमपुरुषों में हनुमान जी
विद्याधरों में सुदर्शन, रत्नों में पद्मराग
सुंदर वस्तुओं में कमल की कली ।
तृणों में कुश, हविष्यों में गाय का घी
व्यापारियों में रहने वाली लक्ष्मी
छल कपट करने वालों में धूतक्रीड़ा
तितक्षुयों की तितिक्षा मैं ही ।
सात्विक पुरुषों में रहने वाला सत्वगुण
बलवानों में उत्साह और पराक्रम हूँ
तथा मैं भगवदभक्तों में
भक्तियुक्त निष्काम कर्म हूँ ।
वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युमण, अनिरुद्ध
नारायण, हयग्रिव, वराह, नरसिंह, ब्रह्मा हैं
वैष्णवों के पूज्य इन नो मुनियों में
पहले एवं श्रेष्ठ मुनि वासुदेव मैं ।
गन्धर्वों में विश्वावसु और
अप्सराओं में अप्सरा पूर्वचिति
पर्वतों में स्थिरता और
पृथ्वी में शुद्ध गन्ध मैं ही ।
जल में रस, तेजस्वीयों में अग्नि
सूर्य, चन्द्र, तारों में प्रभा
एकमात्र गुण शब्द हूँ
आकाश में मैं हूँ उसका ।
ब्राह्मण भक्तों में बलि मैं
अर्जुन हूँ मैं वीरों में
उत्पत्ति स्थिति उसकी और
प्रलय हूँ मैं प्राणियों में ।
मैं ही पैरों में चलने की शक्ति।
वाणी में शक्ति बोलने की
शक्ति पायु में मलत्याग की
हाथों में पकड़ने की शक्ति ।
आनंदियभोग की शक्ति हूँ
मैं ही इन जन्निंद्रियों में
त्वचा में स्पर्श की, नेत्रों में ध्यान की
स्वाद लेने की शक्ति रसना में ।
कानों में श्रवण नासिका में सूंघने की
इंद्रिय शक्ति मैं समस्त इंद्रियों की
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज
महतत्व, पंचभूत, प्रकृति, गुण मैं ही ।
इन तत्वों की गणना और
लक्षणों द्वारा उनका ज्ञान मैं ही
तथा तत्वरूप ज्ञान उनका
काल जो है वो भी मैं ही ।
मैं ही ईश्वर, मैं ही जीव हूँ
मैं ही गुण और मैं ही गुणी
मैं ही हूँ सबका आत्मा
और सब कुछ भी मैं ही ।
मेरे अतिरिक्त कहीं भी नहीं
कोई भी पदार्थ और कोई
यदि मैं गिन ने लगूँ तो
गनना ना कर सकूँ अपनी विभूतियों की ।
क्योंकि जब मेरे रचे हुए ये
कोटि कोटि ब्रह्मांडों की
गनना नहीं हो सकती तो फिर
विभूतियों की गनना कैसे हो सकती ।
ऐसा समझो कि जिसमें भी
तेज, श्री, ऐश्वर्या, कीर्ति
त्याग, सौंदर्य, सौभाग्य आदि
श्रेष्ठ गुण हैं, वो अंश मेरा ही ।
उद्धव जी, तुम्हारे प्रश्न अनुसार ही
विभूतियों का वर्णन किया मैंने
मन में सोची, वाणी से कही वस्तु
वास्तविक नहीं, कल्पना होती ये ।
इसलिए वाणी के भाषण को रोककर
मन के संकल्प, विकल्प बंद करो
प्राणों को तुम वश में करके
अपनी इंद्रियों का दमन करो ।
बुद्धि को शांत करो तुम
फिर जन्म मृत्यु में भटकना ना पड़े
भक्त को चाहिए कि बुद्धि से
वाणी, मन, प्राण को संयम करे ।
