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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत - २१९ ;चीर हरण

श्रीमद्भागवत - २१९ ;चीर हरण

4 mins 361 4 mins 361


परीक्षित, जब हेमंत ऋतु आई 

इस ऋतु के मार्गशीर्ष महीने में 

यमुना में स्नान कर कुमारियाँ 

कात्यायिनी देवी की पूजा करें।


देवी की आराधना करके कहें 

कि कृष्ण ही हमारे पति हों 

कृष्ण लीलाओं का गान करती हुईं 

स्नान करने यमुना में जातीं वो।


प्यमुनातट पर ऐसे ही एक दिन 

वस्त्र उतार रख दिए उन्होंने 

स्नान करने जल में चली गईं 

अभिलाषा छिपी न उनकी कृष्ण से।


उनका अभिप्राय जानकर 

सखा ग्वालबालों के साथ में 

यमुना तट पर वे चले गए 

गोपियों के वस्त्र उठा लिए।


कदम्ब के पेड़ पर चढ़ गए वो 

हसीं की बातें करें गोपिओं से 

कहने लगे, इच्छा हो जिसकी 

आकर यहाँ वस्त्र ले जाये।


मेरे सब ये सखा जानते 

झूठी बात नहीं मैंने कभी की 

ह्रदय प्रेम से भर गया गोपियों का 

देख भगवान् की हंसी मसखरी।


तनिक सकुचाकर एक दूजे को 

देखतीं और मुस्कुराने लगीं 

जल से बाहर न निकलें 

वे कंठ तक डूबी हुईं थी।


शरीर थर थर कांप रहा उनका 

श्री कृष्ण से कहा उन्होंने 

ऐसी अनीति न करो तुम 

हमारे वस्त्र दे दो तुम हमें।


हम तुम्हारी दासी हैं और 

करने को तैयार, जो कुछ कहो तुम 

हमारे वस्त्र वापिस दे दो हमें 

नहीं तो नंदबाबा से कहें हम।


तब भगवान् कृष्ण ने कहा, सुनो 

मुस्कान तुम्हारी प्रेम से भरी 

अपने को दासी स्वीकार करती मेरी 

आज्ञा पालन मेरा करना चाह रही।


तो यहाँ आकर तुम सभी 

अपने अपने वस्त्र ले जाओ 

कंधे पर वस्त्र रख लिए 

जब गोपियाँ उनके पास आयीं तो।


मुस्कुराते हुए बोले, गोपियों 

व्रत जो किया था तुमने 

अच्छी तरह निभाया उसको पर 

वस्त्रहीन हो इस अवस्था में।


तुमने जल में स्नान किया है 

उससे जल के वरुण देवता 

का अपराध हुआ है और 

अपराध हुआ है यमुना जी का।


अतः इस अपराध के दोष की 

शांति के लिए तुम अपने 

हाथ जोड़कर सिर से लगा लो 

और झुककर प्रणाम करो उन्हें।


तदनन्तर अपने वस्त्र ले जाओ 

तब निर्विघ्न पूर्ती के लिए व्रत की 

गोपियों ने भगवान् कृष्ण को 

नमस्कार किया था क्योंकि।


उन्हें नमस्कार करने से 

भाजन होते, अपराध, त्रुटियां सभी 

और गोपियों से प्रसन्न हो 

भगवान् ने वस्त्र दे दिए उन्हें तभी।


रुष्ट न हुईं वो कुमारियाँ 

वस्त्र हरण और कृष्ण की बातों से 

बल्कि वे तो प्रसन्न हुईं थीं

अपने प्रियतम के संग से।


अपने अपने वस्त्र पहन लिए 

और कृष्ण जी ने जब देखा 

कि व्रत धारण किया गोपियों ने 

उन्हें चरणकमलों की कामना।


एकमात्र संकल्प ये ही उनके जीवन का 

तब भगवान् ने उनसे कहा 

मेरी परम प्रेयसी गोपियों 

तुम्हारे संकल्प को पूर्ण करूंगा।


पूजा करना चाहती तुम मेरी तो 

मेरी पूजा तुम कर सकोगी 

तुम अब अपने घर को जाओ 

साधना सिद्ध हो गयी तुम्हारी।


आने वाली शरद ऋतू में तुम 

मेरे साथ विहार करोगी 

इसी उदेश्य से ही तो तुम सब ने 

कात्यायिनी देवी की पूजा की थी।


गोपियों के वस्त्रों के रूप में 

समस्त संस्कारों के आवरण को उनके 

कृष्ण अपने हाथ में लेकर 

कदम्ब वृक्ष पर बैठे थे।


गोपियाँ जल में थीं जब 

सर्वव्यापक सर्वदर्शी कृष्ण से 

मानो अपने को ग़ुप्त समझ रहीं 

इस तत्व को भूल गयीं वो।


कि कृष्ण जल में ही नहीं हैं 

सवयं जल स्वरुप हैं वही

कृष्ण के सन्मुख जाने में 

बाधक हैं ये संस्कार सभी।


कृष्ण के लिए सब भूल गयीं वो 

परन्तु भूलीं थी अपने को ना 

चाहतीं थीं केवल श्री कृष्ण को परन्तु 

संस्कार चाहते थे पर्दा रखना।


प्रेम, प्रेमी और प्रियतम के बीच में 

पुष्प का भी पर्दा नहीं चाहिए 

जब तक सर्वस्व न दिया जाये 

प्रेम, समर्पण अपूर्ण रहते।


इसी अपूर्णता को दूर करते हुए 

श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि 

‘ अपने सर्वस्व को भूलकर 

मेरे पास आ जाओ अभी ‘| 


गोपियों ने कहा कृष्ण हम 

अपने आप को कैसे भूलें 

हम सभी आकण्ठमग्न हैं 

संसार के इस अगाध जल में।


आना चाहने पर भी ना आ पा रहीं 

तुम्हारे सामने उन्मुक्त हृदय हमारा 

हम तुम्हारी दासी समान है 

पालन करें तुम्हारी आज्ञा का।


परन्तु हमें निरावरण करके 

अपने सामने मत बुलाओ 

साधक की यह दशा कि 

चाहता भगवान को पर संस्कार न छोड़े वो।


संस्कारों में ही उलझे रहना 

यही द्विविधता दशा है उनकी 

भगवान् कहें संस्कार छोड़कर 

निरावरण होकर आ जाओ तुम सभी।


परमात्मा और जीव के बीच में 

व्यवधान है यह पर्दा ही तो 

आकांक्षाएं पूरी हों तुम्हारी 

हट गया अब ये पर्दा जो।


कृष्ण का आह्वान, मिलन का आमन्त्रण

जिसके अंदर प्रकट हो जाता 

वह सब कुछ भूलकर, कृष्ण के 

चरणों में दौड़ा चला आता।


फिर ना कुछ करने की सुध रहती 

ना लोगों का ध्यान ही रहता 

विशुद्ध और अनन्य भगवत्प्रेमियों में 

अक्सर ऐसा ही है होता।


श्री कृष्ण के हाथ, कन्धों का 

स्पर्श पा वस्त्र, वस्त्र ना रहे 

भगवान् का वो प्रसाद बन गए 

गोपियाँ तब धारण करें उन्हें।


ये वस्त्र परम सुंदर प्रतीक भगवान् के 

गोपियाँ मर्यादा के ऊपर थीं 

फिर भी उन्होंने ये मर्यादा 

भगवान की इच्छा से स्वीकार की।


श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

कृष्ण कृपा से गोपियों की भी 

सारी कामनाएं पूर्ण हो गयीं 

वे सभी व्रज में चली गयीं।


एक दिन ग्वालबालों के साथ में 

भगवान् कृष्ण और बलराम जी 

वृन्दावन में दूर निकल गए 

उस समय ग्रीष्म ऋतू थी।


घने घने वृक्ष श्री कृष्ण के 

छाते की तरह काम कर रहे 

भगवान् ने ग्वालबालों से कहा 

‘ भाग्यवान कितने वृक्ष ये |


 इनका सारा जीवन ही देखो 

दूसरों की भलाई के लिए 

वर्षा, धुप और पाला सहते 

हम लोगों की रक्षा करते ये।


ये वृक्ष सबसे श्रेष्ठ हैं 

पत्ते, फूल, फल, छाया आदि से 

लोगों का भला करते हैं 

उनकी कामना पूर्ण करते।


संसार में प्राणी तो बहुत हैं 

 परन्तु सफलता इतने में ही जीवन की 

कि अपने धन से, विवेक से 

वाणी से और प्राणों से भी।


ऐसे कर्म किये जाएं कि 

दूसरों की भलाई हो जिसमें ‘

फिर भगवान् वृक्षों से निकलकर 

यमुना के तट पर चले गए।


यमुना का जल मधुर, शीतल था 

गौओ को जल पिलाया उन्होंने 

फिर स्वयं भी जलपान किया 

फिर उन्हें कहा ये ग्वालबालों ने।



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