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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

Classics


श्रीमद्भागवत - १९७;भगवान् द्वारा पृथ्वी को आश्वासन, वासुदेव देवकी का विवाह

श्रीमद्भागवत - १९७;भगवान् द्वारा पृथ्वी को आश्वासन, वासुदेव देवकी का विवाह

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राजा परीक्षित ने पूछा, भगवन

सुनाईये अब कृपाकर आप मुझे

पवित्र चरित्र बलराम जी और उनके

साथ अवतीर्ण हुए श्री कृष्ण के।


श्री कृष्ण कुलदेवता हैं मेरे

कौरवों की सेना के समुन्द्र को

कृष्ण के चरणकमलों की नौका

लेकर पांडवों ने पार किया उसको।


महाराज, मेरा शरीर ये

अश्वथामा के ब्रह्मास्त्र से

जो जल ही चूका था

उसकी रक्षा की थी उन्होंने।


समस्त शरीरधारियों के भीतर

आत्मा रूप में स्थित रहकर वे 

अमृततत्व का दान कर रहे

बाहर मृत्यु का, कालरूप में।


भगवन, आपने अभी बतलाया कि

बलराम रोहिणी के पुत्र थे

इसके बाद उनकी गणना की

देवकी के भी पुत्रों में।


दूसरा शरीर धारण किये बिना

कैसे संभव कि दो माता हों ?

और पिता का घर छोड़ कृष्ण

चले गए थे व्रज में क्यों।


कौन कौन सी लीलाएं कीं

ब्रज में जाकर उन्होंने

और अपने ही मामा

कंस को क्यों मारा उन्होंने।


अन्य यदुवंशियों के साथ में

रहे कितने वर्ष द्वारका में

और भगवान् की कितनी पत्नियां थीं

ये सब लीलाएं उनकी सुनाईये।


अन्न जल त्याग दिया है मैंने

परन्तु फिर भी नहीं सत्ता रही

असह भूख प्यास मुझे, क्योंकि

लीला का पान कर रहा मैं उनकी।


सूत जी कहें, हे शोनक जी 

शुकदेव जी ने अभिनंदन किया

परीक्षित के इन प्रश्नों का और

कृष्ण लीलाओं का वर्णन प्रारम्भ किया।


शुकदेव जी ने कहा, राजर्षि

कृष्ण की कथा के सम्बन्ध में

प्रश्न करने से ही श्रोता और

प्रशनकर्ता पवित्र हो जाते।


परीक्षित, उस समय दैत्य लोग सब

घमंडी राजाओं का रूप धारण कर

आक्रान्त कर रखा था उन्होंने

भारी भार डाल पृथ्वी पर।


उससे त्राण पाने के लिए

ब्रह्मा जी की शरण में गयी पृथ्वी

गौ का रूप धारण कर रखा

नेत्रों से आंसुओं की वर्षा हो रही।


मन तो खिन्न था ही उनका

शरीर भी बहुत कृश हो गया

रंभा रही थीं करुणा स्वर में

ब्रह्मा जी के पास जाकर सब कहा।


कष्ट जब अपना सुनाया उन्होंने

शंकर, देवताओं को साथ लेकर वे

गौ रूप पृथ्वी को साथ ले

क्षीर सागर के तट पर गए।


पुरूषसूक्त के द्वारा वहां

प्रभु की स्तुति की उन्होंने

ब्रह्मा जी समाधिस्थ हो गए

आकाशवाणी सुनी उसी अवस्था में।


उन्होंने देवताओं से कहा

भगवान् की वाणी सुनी है मैंने

मेरे द्वारा तुम भी सुनो उसे

पृथ्वी के कष्ट का पता पहले ही उन्हें।


अपनी काल शक्ति के द्वारा

पृथ्वी का भार हरण करने को

जब वह पृथ्वी पर लीला करें

तुम सभी उनको सहयोग दो।


स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् हरि

प्रकट होंगें वासुदेव के घर में

भगवान् शेष अवतार ग्रहण करें

पहले ही बड़े भाई के रूप में।


योगमाया जो हैं भगवान् की

अंश रूप में अवतार ग्रहण करें

इस प्रकार सब देवताओं को

आज्ञा दे दी ब्रह्मा जी ने।


पृथ्वी को भी समझाया और

ढांढ़स बंधाया था उन्होंने

यह आज्ञा दे सब लोगों को

ब्रह्मा अपने धाम चले गए।


प्राचीन काल में यदुवंशी राजा एक

शूरसेन रहते मथुरा में

भगवान् श्री हरि भी वहां

सर्वदा विराजमान थे।


शूर के पुत्र वासुदेव जी का

विवाह हुआ था देवकी जी से

नवविवाहिता पत्नी को घर लाने के लिए

रथपर वे सवार हो गए।


अग्रसेन का लड़का कंस था

उसकी चचेरी बहन देवकी

उसको प्रसन्न करने के लिए कंस ने 

रथ के घोड़ों की रास पकड़ ली।


स्वयं ही कंस रथ को हांकने लगा

देवक देवकी के पिता थे

पुत्री से बड़ा प्रेम था

विदा करते समय उन्होंने।


सोने से जडे हाथी, घोड़े, रथ

और दासियाँ दहेज़ में दी थीं

रथ को हाँक रहा कंस, मार्ग में

एक आकाशवाणी हुई थी।


कंस को सम्बोधन कर कहा

' मूर्ख, जिसे रथ में ले जा रहा

उसका पुत्र मारेगा तुम्हे

उसके आठवें गर्भ में जो होगा '।


कंस बड़ा ही पापी था

दुष्टता की सीमा न उसकी

भोजवंश का वो कलंक था

और सुनते ही आकाशवाणी।


तलवार खींच ली थी उसने

और चोटी पकड़ बहन की

मारने को तैयार हुआ उसे

क्रूर तो पहले से वो था ही।


पाप कर्म करते करते

निर्लज्ज भी हो गया था

यह कर्म करते देख उसे

वासुदेव ने ये कहा था।


वासुदेव ने कहा, 'आप तो

होनहार वंशधर भोजवंश के

तथा ये कुल महान जो

इसकी कीर्ति बढ़ाने वाले।


इधर यह एक तो स्त्री

दुसरे आपकी बहन भी ये

तीसरे विवाह का शुभ अवसर है

फिर कैसे मार सकते हैं आप इसे।


वीरवर, जो जन्म लेते हैं

उनके शरीर के साथ ही

मृत्यु भी जन्म ले लेती उनकी

आज हो या सौ वर्ष के बाद ही।


जब शरीर का अन्त हो जाता 

जीव कर्मनुसार ही अपने

पहले शरीर को छोड़ देता है

दुसरे शरीर को पहले ग्रहण करके।


जीव का मन विकारों का पुंज है

जब वह अपने स्वरुप के

अज्ञान द्वारा रचे हुए शरीरों को 

अपना मान लेते हैं वो उन्हें।


और मोहवश इनके आने जाने को

अपना आना जाना मान बैठे 

इसलिए कल्याण जो चाहते अपना

द्रोह न करें वो किसी से।


क्योंकि कर्मों के आधीन ही अपने

किसी से भी जो द्रोह करेगा

इस जीवन में शत्रु से, बाद में 

परलोक में भी भयभीत करेगा।


कंस, आपकी ये छोटी बहन है

बच्ची है अभी, बहुत दीन ये

अभी अभी विवाह हुआ इसका

आपकी कन्या समान ये।


आप जैसे दीनवत्स्ल के लिए

वध करना उचित नहीं इसका '

इस तरह वासुदेव ने कंस को

सामनीति, भेदनीति से समझाया।


प्रशंशा भी की, भय भी दिखाया

परन्तु कंस तो बहुत क्रूर था

अपने संकल्प को नहीं छोड़ा उसने

राक्षसों का वो अनुयायी था हो रहा।


देखकर विकट हठ कंस का

विचार किया फिर वासुदेव ने

किसी प्रकार से यह समय टल जाये

एक निश्चय पर पहुंचे तब वे।


' बुद्धिमान पुरुष को चाहिए

जब तक उसका बुद्धि, बल साथ दे

अपनी मृत्यु को टालने का

प्रयत्न तब तक करना चाहिए उसे।


प्रयत्न करने पर भी यदि

टल न सके मृत्यु उसकी

प्रयत्न करने वाले पुरुष का

नहीं रहता है तब दोष कोई।


इसलिए इस मृत्युरूप कंस को

प्रतिज्ञा करके कि मैं उसे

अपने पुत्र दे दूंगा सब

देवकी को बचा लूँगा इससे।


यदि मेरे लड़के होंगे और तबतक

कंस स्वयं न मरा, क्या होगा तो

संभव है उल्टा ही हो और

मेरा लड़का मार डाले उसको।


क्योंकि पार पाना कठिन है

इस विधान का, विधाता के

लौट आये, टली मृत्यु भी

सामने आकर भी, मृत्यु टल जाये '।


अपनी बुद्धि अनुसार ऐसा फिर

निश्चय करके वासुदेव ने कहा

सम्मान के साथ और हँसते हुए

पापी कंस की करते हुए प्रशंसा।


' आपको देवकी से तो कोई भय नहीं

जैसा कि कहा है आकाशवाणी ने

उन सब को सौंप दूंगा आपको

भय है देवकी के जिन पुत्रों से।


शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित

कंस ये जनता था कि

वासुदेव झूठ नहीं बोलते, और

जो कहा उन्होंने, युक्ति संगत भी।


इसलिए उसने विचार छोड़ दिया

मारने का अपनी बहन को

वासुदेव प्रसंशा कर उसकी

चले गए फिर अपने घर को।


सती साध्वी थी देवकी बड़ी

देवता निवास करें उसके शरीर में

एक एक कर आठ पुत्र हुए

प्रतिवर्ष एक, देवकी के गर्भ से।


एक कन्या भी उत्पन्न हुई थी

कीर्तिमान नाम पहले पुत्र का

वासुदेव ने जन्म होते ही उसे

कंस को लाकर दे दिया।


ऐसा करते समय वासुदेव को

कष्ट तो अवश्य हुआ था

परन्तु कहीं वचन मेरे झूठे न हों

उससे बड़ा कष्ट उन्हें इस बात का।


परीक्षित, सत्यसन्ध पुरुष जो

बड़े से बड़ा कष्ट सह लेते

किसी बात की अपेक्षा न हो

उन्हें जो ज्ञानी हैं होते।


नीच पुरुष बुरे से बुरा

काम भी कर सकते हैं, और जो

जितेन्द्रिय हैं, सब कुछ त्याग दें 

 लेकर आश्रय भगवन का वो।


कंस ने देखा वासुदेव का

पुत्र के जीवन और मृत्यु में

समान भाव है, एवं वे

सत्य के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे।


ये देख प्रसन्न हुआ कंस और बोला

वासुदेव ले जाईये इसको

इससे मुझे कोई भय नहीं

ऐसा कहा था आकाशवाणी ने तो।


कि देवकी के आठवें गर्भ से

उत्पन्न पुत्र से मृत्यु होगी मेरी

वासुदेव ने कहा, ठीक है

लौटा लाये उस बालक को तभी।


परन्तु उन को मालूम था कि

कंस बड़ा ही दुष्ट है

मन उसके हाथ में नहीं है उसका

किसी क्षण भी बदल सकता है।


परीक्षित, इधर भगवान् नारद जी

कंस के पास आये और बोले

कंस ! नन्द अदि गोप जो

ब्रज में हैं रहने वाले।


उनकी स्त्रियां और वासुदेव आदि जो

देवकी और यदुवंश की स्त्रियां

नन्द, वासुदेव के बंधू बांधव 

और सगे सम्बन्धी सब हैं देवता।


वो भी देवता ही हैं

जो तुम्हारी सेवा कर रहे

दैत्यों से पृथ्वी का भार बढ़ गया

उनके वध की तैयारी कर रहे।


देवर्षि नारद चले गए जब

निश्चय हो गया कंस को तब ये

कि यदुवंशी सब देवता हैं 

और विष्णु जन्म लें देवकी के गर्भ से।


देवकी, वासुदेव को उसने तब

हथकड़ी लगाकर कैद कर लिया

जो भी पुत्र होते गए उनके

होते साथ ही मारता गया।


हर बार शंका बनी रहती

कहीं यही बालक न काल हो उसका

परीक्षित, कंस जनता था कि

पहले वो कालनेमि असुर था।


विष्णु ने उसे मार डाला था

इसलिए अब यदुवंशियों से उसने

घोर विरोध ठान लिया था

कष्ट देने लगा वो उन्हें।


यदु, भोज, अन्धक वंश के 

अधिनायक अपने पिता उग्रसेन को

कैद कर दिया और शूरसेन देश का 

स्वयं राज्य करने लगा वो।


 


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