शोर
शोर
मुझे शोर पसंद नहीं
शहरों का शोर जानलेवा है
मुझे पसंद है तो बस
कलकल करता पानी
बहती नदी का शोर
चिड़ियाओं का कोल्हाहल
समंदर की उफनती लहरें
झरनों का गिरता पानी
ठहरी शांत झील
झूमते गुनगुनाते पौधे
पहाड़ों की शाम का सन्नाटा
वो चाय के बागान
घुमावदार बलखाती सड़कें
वहां चहल कदमी करते हम तुम
खोपचों पे बैठ कर चाय पीना
हल्की हल्की वो ठंड
कविता कहानियों पे चर्चा करना
बस नहीं पसंद है मुझे कुछ
तो भीड़ का शोर
पहाड़ के मॉल रोड की भीड़
वो दौड़ते भागते लोग
मुझे इंसानों के भीतर वाले शोर
से भी घबराहट होती है
जाने क्या उथल पुथल मची
होती है अंदर के शोर से
शोर बाहरी हो या भीतरी
अखरता बहुत है
ना जीने देता है ना मरने।
