शिव दर्शन: आध्यात्मिक पूजा
शिव दर्शन: आध्यात्मिक पूजा
दो आँखों से शिव को देखने वाली भीड़ बहुत है,
हाथ में चिलम-भाँग, माथे पर रोली-चंदन की रीत बहुत है।
लोटकी में दूध-गंगाजल, साजी में आक-धतूरे के फूल बहुत है,
काँधे पर कांवड़, डीजे पर भोजपुरी नाच में भीर बहुत है!
व्रत के दिन पेड़ा, केला, जूसम-जूस,
और अगले दिन थाली भरकर ठूसम ठूस !
पूजा के नाम पर पढ़ाई और काम से आराम,
पर मंदिर जाकर शिव को निहारना—बस यही बन गया धर्म का काम।
वाह रे इंसान!
कहीं कोई शिव बनकर पार्वती का कर रहा शिकार,
तो कहीं कोई पार्वती बनकर किसी शिव की आँखों में समा रही है यार।
पुजारी सब देखकर भी कर रहा शिव का झूठा प्रचार,
क्योंकि बाबा की झोली भर रहे हैं उपहार।
वाह रे कर्मकांडी!
क्या खूब है तेरा धार्मिक उपचार!
वाह रे जमाना!
क्या खूब शिव को जाना,
क्या खूब खुद को शिव-भक्त माना!
तू सामाजिक पुजारी बनकर
बाहर-बाहर शिव को ढूँढ़ता रहा,
मंदिर-मंदिर जाकर दूध और गंगाजल चढ़ाता रहा।
पर तेरे मन में एक सवाल
बार-बार उठता रहा—
इतने कर्मकांडों के बाद भी न शिव मिल रहे हैं,
न ही मिल रहा रत्ती भर सुकून!
इसलिए, प्यारे—
पूजा तो सिर्फ और सिर्फ आध्यात्मिक हो सकती है,
शिव-साधना तो केवल अंतरमन में ही हो सकती है!
इसलिए कर्मयोगी बनो,
अपना हर कर्म पवित्रता से करो।
जो जिम्मेदारी मिली है,
उसे पूरी निष्ठा से निभाओ।
बाहर शरीर अपना कर्तव्य निभाता रहे,
पर भीतर मन शिव का नाम गाता रहे।
हाथ अगर कर्म में लगे रहें,
तो मन शिव में लीन रहे।
जीवन अपनी गति से चलता रहे,
पर चेतना शिव में ठहरती रहे।
यही पूजा है, यही साधना है,
यही शिव तक पहुंचने का रास्ता है!
जो इस साधना में निरंतर लीन रहेगा,
एक दिन स्वयं के भीतर शिव को देखेगा।
धीरे-धीरे उसकी तीसरी आँख खुलेगी,
और अज्ञान की रात भीतर से ढलेगी।
फिर शिव मंदिर की मूर्ति में नहीं,
बल्कि अपने कर्मों में दिखाई देंगे,
अपने विचारों में दिखाई देंगे,
अपने अंतरमन में दिखाई देंगे।
और जब खोज पूरी हो जाएगी,
जब भीतर की दूरी मिट जाएगी,
तब साधक बाहर शिव को नहीं पुकारेगा—
उसके भीतर से एक स्वर उठेगा—
“ढूँढ़ता-ढूँढ़ता मैं स्वयं खो गया,
जिसे ढूँढ़ता था, आज स्वयं हो गया,
इसलिए:
“शिवोऽहम्... शिवोऽहम्”
