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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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शीत ऋतु

शीत ऋतु

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कम होते तापमान से देती है,आहट

शीत ऋतु ताप से करती है,बगावत

पहनने को निकालते,हम गरम वस्त्र

शीत ऋतु आते ही करती है,शरारत

नहाना-धोना,खाना सब बदल जाता

शीत ऋतु बदल देती है,हमारी आदत

अधिक खाना और अधिक ही गाना

शीत ऋतु भूख की बढ़ाती है,जरूरत

राते हो जाती है,शीत ऋतु में छोटी

दिन की खाते है,सब ही कम रोटी

शरद पूनम का जब खत्म होता,पथ

तब शीत ऋतु की हो जाती है,आहट

सूर्य की किरणों में आ जाती,नज़ाकत

शीत ऋतु में ऐसे होती ताप में गिरावट

शीत ऋतु से सब ही करते है,मोहब्बत

शीत ऋतु में जठराग्नि मिटती,गुरबत

शीत ऋतु बढ़ा देती है,उनकी कीमत

जिनके इरादों में होती,सच की ताकत

शीत ऋतु उनके लिये है,एक जन्नत

जो लक्ष्य पाने हेतु है,नित प्रयासरत।



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