सफ़र अनजाना
सफ़र अनजाना
न तितली,न जुगनू न गुब्बारे
जाने कहाँ गए वो सारे के सारे
आज भी पुकारते हैं हमको
वो मैदान, वो गलियारे।
न जाने कहाँ गया वो बचपन
कहाँ गए वो शैतान सारे।
बड़ा कीमती था वो बचपन
और बेशकीमती थे
वो मेला वो झाँकी
वो जुगनू वो तारे ।
वो कागज की कश्ती का
सफर बारिशों में।
वो पतंगों की उड़ान
ऊँचे आसमानों में।
थे हमको अपने
सभी शौक प्यारे ।
चाहते थे तब हम
बड़े हो जाना।
चाहते थे तब हम
ऊचाइयों को छू पाना ।
किसे पता था
कीमत ऊचाइयों की?
मासूमियत को खो के
अक्लमंदी को पाना।
बेफिक्री से अचानक
ज़िम्मेदारियों की तरफ जाना।
आँसुओं को छुपाकर
वो बनावटी मुस्कुराना।
किसे पता था
कि कितना महंगा पड़ेगा
ये सफर अनजाना।
बचपन से अचानक
यूँ बड़े हो जाना।
