सच कौन सुनना चाहता है
सच कौन सुनना चाहता है
आज उसके भीतर के ज्वालामुखी को
फटते हुए देखा
उसके मौन को क्रोध में बदलते हुए देखा
उसके शब्द में शब्द भेदी बाण की टंकार सुनी
उसके भीतर निरीह आत्मा को तड़पते हुए
अनुभूत किया
क्योंकि वह अन्याय के विरुद्ध बोलना चाह
रहा था
वह साधारण होते हुए भी अपने कर्तव्य के साथ
अपने कर्म भी गिना रहा था
पर कौन सुन पाया उसके अन्तर्मन की कराह
किसने देखा उसकी आँखो में तैरते हुए सागर
किसने थामा उसे जबकि वह पूरी तरह लड़खड़ा
रहा था
उसके चेहरे की शिकन को कोई नहीं देख पाया
क्योंकि वह निहायत सच्चा था
और आज के दौर में यह सच्चाई
धरी की धरी रह जाती है
आज सच कौन सुनना चाहता है
आज सच कौन देखना चाहता है
आज सच कौन बोलना चाहता है
क्योंकि खामोशी ही आजकल अच्छी है
सुना है शब्दों से उलझनें बढ़ जाती हैं
