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Shakuntla Agarwal

Abstract Classics Others

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Shakuntla Agarwal

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"सबके मन मंदिर में राम"

"सबके मन मंदिर में राम"

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बाहर क्यों तू भटके बंदे,

त्याग  दे सब अभिमान 

भीतर ही  वो बैठा है,

जो  है  जग  का प्राण 

पत्थर की मूर्त  में ढूंढा, 

ढूंढा  तीर्थ  धाम,

निर्मल मन दर्पण  में झांक, सबके मन में राम। 

जब-जब तूने हाथ बढ़ाया, दीन-दुःखी के काम,

समझो तेरे मन मंदिर में, आ बैठे श्री राम। 

राम नाम की लगन लगा ले, तज दे सब अभिमान, 

सांस-सांस में जप ले प्यारे  सबके मन मंदिर  में राम। 

न कोई ताला, न कोई  पहरा, खुला ये दरबार 

श्रद्धा के दो फूल चढा दे, हो जाए  उद्धार। 

क्रोध रावण को तु जला दे, मन की लंका जीत

सुनाई  देगी तभी तुझे, अनाहत वाली प्रीत। 

ह्रदय सिंहासन पर बैठे हैं, धनुष  हाथ  में धारे

उनकी करुणा की छाया में,तर जाएंगे सारे।

जीवन की हर  उलझन का बस, एक ही है परिणाम, 

अंत समय में साथ चलेगा मन मंदिर  का राम। 

गंगा  ,जमना तेरे भीतर, भीतर  ही कावा काशी 

राम नाम की राह पकड़ ले, कट जाए यम की फांसी।

कितना तु भागेगा प्राणी, कहीं तो कर विश्राम। 

समर्पण  कर दे सभी राम  को,

सबके मन में बसे राम। 

- शकुन्तला अग्रवाल, जयपुर


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