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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

सब अपने हैं, मैं ही दुश्मन

सब अपने हैं, मैं ही दुश्मन

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मैं मैं कर सबको किया पराया,

अंत समय कुछ हाथ न आया।

अब भी चेत, होश में आ जा,

क्यों अपना ही दुश्मन बना हुआ।


सब अपने हैं, मैं ही दुश्मन,

अहंकार से भरा हुआ।


जग सपना है, खोल नैन अब अपने,

अहंकार में चूर रहा खो देगा सब सपने।

जब तक मैं रहती अन्तःकरण में,

स्वयं का दुश्मन बना हुआ।


सब अपने हैं, मैं ही दुश्मन

 अहंकार से भरा हुआ।


राग द्वेष तज, बैर भाव भूल जा,

इनसे जीवन नरक बन जाएगा।

इस काया से सत्कर्म ही करना,

क्यों मोह माया में फंसा हुआ।


सब अपने हैं, मैं ही दुश्मन,

  अहंकार से भरा हुआ।


तेरा मन ही तुझको दिखलाए,

क्या अच्छा और क्या है बुरा।

शुद्ध बुद्ध आत्मा की बात मान,

क्यों दलदल में तू फंसा हुआ।


सब अपने हैं, मैं ही दुश्मन,

  अहंकार से भरा हुआ।



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