सास- बहू!!
सास- बहू!!
हर सास कभी माँ नहीं बन सकती
हर बहु कभी बेटी नहीं बन सकती
क्यूंकि हर बहू को सास माँ जैसी चाहिए होती है
हर सास को बहू बेटी जैसी चाहिए होती है,
ना तो सास गलत होती है
ना बहू गलत होती है
होती है तो सोच गलत होती है
वो जिस आँगन से खिलकर आयी है
वहा ना रोक है ना टोक है
ना ही पाबंदियों का अम्बार है
ना तानो की बौछार है
पिता कें कंधे को हिला कर कहती है
चलिए हम मिलजुल कर क्यों ना रोटियां बनाए
ये सुन माँ एक बार बिफर कें कहती है
बेटियां पराई है
जिस घर जाएगी क्या यही करेगी
सास कें ताने से हर रोज हमारा स्वागत करेगी
चल उठ खुद बना आड़ी तिरछी रोटियां
एक ना एक दिन तो बन जाएगी गोल रोटियां,
ना माँ ऐसा ना होने दूंगी
मैं उन्हें भी अपनी माँ और पिता को अपना पिता मानूगी
यही भूल उससे हो जाती है
वो माँ कें ताने को याद कर हर रोज सास कें ताने सुन जाती है
आंखे मीच पिता कें कंधे को महसूस कर अब वो गोल रोटियां बना जाती है
ना बेटी गलत है न बहू गलत है
गलत है तो सोच गलत है
अब जरा आगे भी सुनिए.......
हर सास कभी माँ नहीं बन सकती
हर बहु कभी बेटी नहीं बन सकती
क्यूंकि हर बहू को सास माँ जैसी चाहिए होती है
हर सांस को बहू बेटी जैसी चाहिए होती है,
ना तो सास गलत होती है
ना बहू गलत होती है
होती है तो सोच गलत होती है
हर सास एक बेटी और माँ होती है
तब जाकर कही बुढ़ापे में सांस कें पद को जीती है
ये उम्र का तगाजा कहिये या श्रेष्ठ होने का दर्जा
एक बेटी जब माँ से सास कें अवतार में आती है
तो वो भूल जाती है की
बहू भी किसी की बेटी है,
वो भी जिस आँगन से आयी है
हँसती खिलखिलाती फ्रीडम को जीती आयी है
मगर यहां तक कें सफ़र में पहुँचते पहुँचते
वो बिल्कुल श्रेष्ठ हो गयी है
उस सास की बेटी कहती है
माँ मेरी सास ने तो जीना मुश्किल कर रखा है
आप तो कितनी अच्छी हो भाभी को बेटी बना रखा है
मेरे लिए ऐसा घर क्यों ढूंढा
जहाँ हर रोज मुझें पीसा जाता है
ये पीड़ा सुन एक बार फिर माँ का दिल पिघल जाता है
लेकिन बहू कें सामने आते सास का अवतार हमला कर जाता है
निकलती है पीड़ा बेटी की सुनकर
निकलती है पीड़ा बेटी की सुनकर
जहर सारा बहु पर उगल जाता है
क्यूंकि हर सास को बहू बेटी जैसी चाहिए होती है,
हर बहू को सास माँ जैसी चाहिए होती है
ना तो सास गलत होती है
ना बहू गलत होती है
होती है तो सोच गलत होती है !
