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Pooja Ratnakar

Abstract


4.0  

Pooja Ratnakar

Abstract


सामित है वो !

सामित है वो !

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होते होंगे फ़रिश्ते

हर गली चौराहे पर ,

पर आज हमने नय्यर को देखा

एक छोटे से आशियाने में ।

फलों से लदे तरु कभी तनते नहीं ,

खामियों से भरा इंसान

कभी झुकते नहीं।

एक बार दिल से झुक कर

तो देख ऐ रतन !

खुदा खूद तेरी रजा़ पूछेगा

ना जाने मेरी जिंदगी की

जुस्तजू क्या है ?

आज रंगों से भरा आसमां

तो कल रेगिस्तान की धूल!!


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