रणभेरी की पुकार
रणभेरी की पुकार
परीक्षा की घड़ी निकट है, संयम को अपनाइए,
मन में धीरज, वाणी में बल, ना कर्तव्य से डिग जाइए।
पहलगामव की पीड़ा गहरी, अब धधक रहा है क्षोभ,
शांत नहीं, अब उत्तर देना, सहन नहीं होता अब क्रोध।
सीमा पर संकल्प जगा है, रणचंडी मुस्काए,
भारत माँ के वीर सपूत अब पीछे ना हट पाए।
राजनीति के भवनों में अब रणयोजना है बनती,
शत्रु की हर चाल-कपट पर, दृष्टि हमारी है रहती।
प्रधानमंत्री की वाणी में है अब ज्वाला गूँज रही,
रक्षा मंत्री के तेवर से पाक की सेना धूज रही।
शब्द नहीं ये अब सन्निपात है, रण का है आमंत्रण,
जोश नहीं अब होश जरूरी, यही राष्ट्र का है चिंतन।
युद्ध स्वयं में अंत है, पर कई बार यह धर्म,
भूमि, भाषा, संस्कृति की रक्षा हेतु करे शस्त्र का कर्म।
सोच समझ के चलता भारत, हर मोर्चे पर जागरूक,
न भूले चुपचाप नहीं है, ये सिंह को लग रही अब भूख।
दुश्मन को कमजोर समझना मूढ़ों की है पहचान,
रण के पहले मन में करना दुर्दिन का ज़रा अनुमान।
यूक्रेन की पीड़ा देखो, कितनी लंबी है रात,
पश्चिम ने दी साँस उसे, बढ़ती जा रही थी बात।
भारत अब उस सूत्र को भी काटने को चला है चाल,
रणनीति की हर चाल में देश अपना लाता भूचाल।
भीतर का जो विष फैला है, उसको भी तो देखें,
सांप्रदायिक ताप न बढ़े, इस दिशा में दृष्टि फैंके।
विपक्ष खड़ा संग साथ में, है यह बड़ा संकेत,
सत्ता से भी ऊपर होता राष्ट्रप्रेम का संवेद।
रण में जाए वीर जब, हो पीछे बल की चिंघाड़,
जनगण से लेकर संसद तक हो मातृभूमि का सिंगार।
महँगाई हो, संकट हो, कुछ किल्लत भी आए,
पर संयम, श्रद्धा और संकल्प हमें सीख जाएं।
कारगिल की राख कहे, रण में क्या मूल्य चुकाया,
अब समय है, उस राख से ही फिर भारत ने है दम दिखाया।
