रजनी
रजनी
झिलमिल तारों की ओढ चुनर,
फिर मन्द मन्द रजनी आई।
रवि ताप से जो अकुलाए थे,
उन पर शीतलता बरषाई।।
मधुर हास उस रजनी का,
बन ओस धरा पर फैल गया।
कण कण प्रमुदित हो गया उसे,
मानो जीवन मिल गया नया।।
निकला चांद गगन मे सुन्दर,
नीडो को खग बापस आए।।
हारे थके घरो मे आकर सब,
अपनी अपनी विश्रांति मिटाए।।
शीतल मन्द पवन मनभावन,
सबके मन को अति भाए।
मिलकर दंपति रजनी में,
मन के सब भेद मिटाए।
