रेत की दुनिया
रेत की दुनिया
छोटी-छोटी चीजें ही जग में,
बड़ी वस्तुओं की आधार है,
बिखर जाना रेत बन जाना है ,
जुड़ कर रहना चट्टान सम्मान है,
उड़ जाए रेत हवा के झोंके से ,
सागर नदियों के प्रवाह में भी,
चट्टान सीना ताने खड़ा हो जाए ,
चट्टान टूटते-बिखरते बन जाते रेत,
रेत भी टूटे- बिखरे कभी,
फिर धूल बन जाएगा,
यही रेत जुड़ जाए तो,
फिर चट्टान बन जाएगा,
छोटे-बड़े के मेल से चलती है दुनिया,
मिल जाए जब एक -दूसरे से,
मिटा खुद के बूंद- रेत और,
अपनी तुच्छता का वजूद,
फिर बढ़ती है दुनिया और,
रफ्तार पकड़ती है दुनिया,
फिर वे चाहे जो भी बन जाए,
सूर्य- चंद्रमा ,धरती-पर्वत, सागर-भवन,
जलयान या फिर वायुयान बन जाए।
देखे तो बूंद-बूंद में सागर समाया है,
कण-कण में बसा है सारा जहां,
बड़े होने का अभिमान न करें,
जुड़कर यदि नहीं रह पाएं,
फिर टूट कर बिखर जाएंगे
रेत न मायूस हो अपनी तुच्छता पर ,
बस खुद से जुड़ जाए ,
करें सबका सहयोग,
फिर वह चाहे जितना बड़ा बन जाएगा,
सदियों तक बड़े शान से झलकता हुआ।
सबका बोझ उठाएगा ,
फिर उसको हवा का झोंका,
या फिर आंधी तूफान भी,
देख कर उसकी शान को ,
किनारे से निकल जाएगा ,
उसकी एक नई पहचान बनेगी,
गर्व से वह सदा ही ईठलाएगा ,
अपनी तुच्छता भूल जाएगा,
हमसब भी सीखे प्रकृति से,
करें अपना विस्तार बने सदा व्यापक ,
धारण करें कोई बड़ा-छोटा नहीं होता ,
बड़े-छोटे की परिभाषा में कुछ रखा नहीं,
आप भला तो जग सही है ।
दुनिया सब अपने-अपने राग में ,
केवल रेत के महल बनाएं नहीं,
सपनों की दुनिया में मत जीएं,
ठोकर खा-खाकर टूट कर ,
धूल बनने से बहुत पहले ,
अच्छा होगा संभल जाए समय रहते,
वरन् धूल में मिल जाओगे ।
अत: वक्त रहते संभल जाएं।
कहती थी मुझे मेरी बहना,
अपने बिहार में आलू-बालू ,
तो सदा ही पर्याप्त रहेंगे ,
पर क्या तेरी शालू सदा तेरी रहेगी ?
हाय शालू !
प्रकृति तो शाश्वत है पर,
इंसान का कोई भरोसा भी नहीं,
आज है कल का पता नहीं,
जाने कब बसा ले अपनी दूसरी दुनिया ,
या फिर चली जाए दूसरी दुनिया में ,
हर हाल में बस हाय ! हाय !!
ही केवल बाकी रह जाएगा ।
कभी झूठ बोल कर या कभी ,
बड़ा टेढ़ा सा मुंह खोल कर ,
करके दु:खी ,खुद के सुख की आस में ,
छोड़ जाएगी तुझे रोता-बिलखता हुआ,
अगर बुला ले उसे ईश्वर फिर,
तो तुम उतना दुखी नहीं होगा ।
चार दिन रो कर सब्र कर लेगा,
जब करेगा मन तब तुम,
उससे बातें भी कर लेगा ,
सपने में मिलकर खुश हो जाएगा।
पर तेरी नजरों से दूर या सामने तुझे,
छोड़कर या फिर तुझसे मुंह मोड़ कर,
चहके और जलाए तुझे इस दुनिया में,
फिर मेरे भाई ! बोल कैसे जी पाएगा?
इसीलिए संभल जा भाई !
दिल मत लगा किसी से ऐसे ,
जुदा होने पर कभी तेरी,
जान ही न निकल जाए।
मत सोच उस अकेले की ,
विचार तुझे चाहने वाले ,
और भी तो बहुत हैं।
