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Yashu Gupta

Inspirational


4  

Yashu Gupta

Inspirational


प्रश्न

प्रश्न

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मेरा प्रश्न सुनते ही घबरा गया एक पाठक,

   प्रश्न था साधारण, लेकिन सुनते ही शुरु किया नाटक |

प्रश्न सुनकर मुस्कराया, थोड़ा घबराया, फिर हिचकिचाया, 

  मैंने कहा- आपका उत्तर तो देना बनता है,

   अपने ही लोग हैं, अपनी ही जनता है |

बात उठी है तो पूरी भी होनी चाहिए ,

   सभा की शालीनता भी न खोनी चाहिए |

घिर गया वो अपने ही बुने जाल में,

   ऐसे वक्त को सोचा न होगा ख्याल में |

अब बात आती है कि था क्या प्रश्न,

   कौन था पाठक, कौन था प्रश्नकर्ता |

अरे साहब ! आधुनिकता की परिभाषा न जान सकी मैं

   मैं ही थी पाठक और प्रश्नकर्ता मैं |

प्रिय पाठकों, आप ही सबाल का उत्तर दीजिए

     मेरे प्रश्न की दुविधा मिटा दीजिए |

क्या यही शिक्षा का मापदण्ड रह गया विद्यालय में ?

   प्रथम गुरु(माँ) को छोड़ आओ वृद्धाश्रम में ?



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