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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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रामायण ७० ; श्री राम का परमधाम गमन

रामायण ७० ; श्री राम का परमधाम गमन

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बहुत समय व्यतीत हुआ जब 

मन में ये विचार आया 

धरती पर अवधि पूरी हुई 

जाने का समय आया। 


ब्रह्मा कहें ये नारद से 

धर्मराज के पास जाओ 

लोक अपने प्रभु आना चाहें 

उनको तुम बुला लाओ। 


ह्रदय में रखकर रामचंद्र को 

धर्मराज फिर चले वहां 

श्रेष्ठ मुनि का वेश धारण किया 

तेजस्वी सुँदर जवां। 


लक्ष्मण द्वार पर खड़े हुए थे 

तपस्वी ने सन्देश कहा 

लक्ष्मण ने कहा रामचंद्र को 

तुरंत आ गए वो वहां। 


तपस्वी कहें जो बात मैं कहूँ 

एकांन्त में ही हम कर पाएं 

मैं बस आपसे ही कह सकता 

कोई और यहाँ न आये। 


तीसरा कोई अगर सुनता इसे 

उसका तभी नाश होगा 

मृत्यु से वो बच न पाए 

भयंकर ये शाप होगा। 


राम कहें तब लक्ष्मण से 

द्वार पर तुम खड़े रहना 

 मुझसे कोई भी मिलने आये 

अंदर न आने देना। 


उसी समय दुर्वाशा आये 

कहें मिलूं राम से मैं 

लक्ष्मण उनको रोकना चाहें 

देखें वो क्रोध मैं हैं। 


क्रोध में बोले ऋषि दुर्वाशा 

रोक टोक गर कोई करे 

धर, राज्य को भस्म मैं कर दूँ 

शाप से मेरे सभी डरें। 


सोचें लक्ष्मण मुनि शाप से 

अच्छा मृत्यु आ जाये 

चले गए वो राम के पास कहें

दुर्वाशा मिलना चाहें। 


राम कहें लक्ष्मण ये तुमने 

बहुत बड़ा अपराध किया 

कर्म की गति कभी टल न सके 

तूने तपस्वी का है शाप लिया। 


राम ने दुर्वाशा को मिलकर 

दंडवत, प्रणाम किया 

बैठकर भोजन कराया 

मुनि आशीर्वाद दिया। 


लक्ष्मण को देख राम दुखी बहुत थे 

भरत जी तब वहां आये 

भेजा भरत को गुरु के पास 

वो उनको बुला लाये। 


जान गए ये गुरु वशिष्ठ कि 

छोड़ के जाना चाहें राम 

लक्ष्मण सोचें राम के बिना 

धरती पर मेरा क्या है काम। 


करें प्रणाम रामचंद्र को 

सरयू के किनारे गए 

जल में खड़े हो राम ध्यान किया 

अपने धाम को चले गए। 


राम हुए थे बहुत व्याकुल 

कहें लक्ष्मण के पास जाऊं 

कहें भरत तुम राज सम्भालो 

भरत कहें, मैं भी आऊं। 


भरत के पुत्र तक्ष को तब 

दक्षिण नगर का राज्य दिया 

दूसरे पुत्र पुष्कर को 

 पुष्कर नगर था सौंप दिया। 


लक्ष्मण के भी दो पुत्र थे 

एक चित्रकेतु, अंगद दूजा 

उन दोनों को भी दे दिए 

उत्तर, पश्चिम के राज्य। 


बड़े पुत्र कुश को फिर 

अयोध्या का राजा बना दिया 

उत्तर दिशा का एक राज्य 

छोटे पुत्र लव को दिया। 


सुग्रीव तभी आये वहां पर 

किष्किंधा का राज्य अंगद को दिया 

विभीषण जब आये वहां कहा 

सौ कलाप तक करो राज्य। 


जाम्ब्बाण से कहा कि तुम 

 द्वापर तक रहो पृथ्वी पर 

युद्ध भूमि में पहचानो मुझ

आऊँगा कृष्ण अवतार मैं धर। 


सरयू के तट पर गए तब 

भरत, शत्रुघ्न साथ चले 

अयोध्यावासी भी साथ में 

हनुमान से तब बोले। 


हे पुत्र, चिरंजीवी रहो तुम 

जब तक सूरज चाँद रहें 

उधर ब्रह्मा के पास पहुँच कर 

धर्मराज उनसे कहें। 


अपने लोक को आने को राम जी 

सरयू के तट पर हैं खड़े 

विमान पर चढ़ कर अपने लोक गए 

नगरवासी हैं दुखी बड़े। 


भरत जी वेद उच्चारण करते

 रामचंद्र में लीन हुए 

शत्रुघ्न भी ईश्वर का नाम ले 

प्रभु में वो विलीन हुए। 


रामचरितमानस की कथा ये 

सब का दुःख हर लेती है 

मन से पढ़ता, सुनता जो है 

सबको सुख ये देती है। 


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