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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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रामायण ५०; सुलोचना कथा

रामायण ५०; सुलोचना कथा

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सुग्रीव ने राम की आज्ञा पाकर

सिर को रखा मेघनाद के

बाण से जो एक भुजा कटी थी

पहुंची लंका आकाशमार्ग से।


मेघनाद के आँगन में गिरी

दासी देखि एक भुजा पड़ी वहां

सुलोचना को उसने बताया

महल छोड़ दौड़ी आई वहां।


देख भुजा विलाप करे वो

पर फिर भी विश्वास करे ना

मार सके पति को वो ही

बारह वर्ष तक जो सोये ना।


मन में विचार ये निश्चय किया

मैं हूँ पतिव्रता एक नारी

भुजा लिख कर संदेह मिटा दे

विनती करती थी वो बेचारी।


मेघनाथ का हाथ फैल गया

खड़ीआ मिट्टी सखी एक लाई

हाथ में दे दी कटी भुजा के

लिखने लग गयी वो लिखाई |


उत्तम यश लिखा राम लक्ष्मण का

और लिखी कथा युद्ध भूमि की

सुलोचना पृथ्वी पर गिर पड़ीं

पढ़ कर सब वो बहुत व्याकुल हुई।


करें विलाप और कहती हैं वो

भुजा देख इंद्र था डरता

अब वो भुजा सोती भूमि पर

दिगपालों को भी जिसका डर था।


बार बार धरती पर गिरती

पति के बल को वो सराहें 

एक सखी ने समझाया जब

भुजा को पालकी में लिटायें।


खुद भी उस पालकी में चढ़ गयी

द्वार पर वो पहुंची रावण के

विषाद करे वो कहे रावण से

ये दशा हुई मेरी, होते आपके।


सारी कथा लिखी भुजा ने

राम लक्ष्मण प्रताप है गाया

शरीर पड़ा है युद्ध भूमि में

मस्तक राम के पास बताया।


रावण कहे शीश मैं लाऊं

मारूं मैं भाईओं को दोनों

कुम्भकरण, मेघनाद तो मर गए

उनके समान मुझे न जानो।


सुलोचना बोली, मनुष्यों का बल

देख चुके फिर भी न मानो

समुन्द्र लाँघ जला गया लंका

उस कपि को छोटा जानो।


कुंभकरण,अतिकाय को और

मेरे पति को मार दिया है

उसको युद्ध में जीतना चाहो

ये अज्ञान नहीं तो क्या है।


पर दूँ मैं जवाब न तुमको

इससे मुझको पाप लगे है

वैसे भी अब फर्क न पड़ता

पति पहले ही खो चुकी मैं।


ये कहकर मंदोदरी पास गयीं

उसको सारी कथा सुनाई

मंदोदरी भी रोने लगी थीं

रावण के साथ हुई बात बताई।


कहें, रावण पति की निन्दा की

बुरा लगा बहुत मुझको तब

कैसे मैं सिर पाऊं पति का

आप बताएं क्या करूं अब।


मंदोदरी कहे अब जो कहूँ मैं

उसको परम सत्य तुम मानो

मैंने सुनी नारद की वाणी

तुम भी सुनकर सब ये जानो।


रावण न समझेगा नीति

चाहे प्राण उसके छूटेंगे

कलेश छूटेगा सीता जी का

रीछ वानर यहाँ घर लूटेंगे।


भाई विभीषण के भेद देने से

टूटेगा लंका का गढ़ ये

छूटेंगे बंधन से देवता

विभीषण यहाँ पर राज करेंगे।


राम के पास जाओ तुम अब

राम सदा नीति परायण हैं

शीश पति का दें वो तुमको

कोमल बहुत ही उनका मन है।


चली पालकी में सुलोचना

वानर सोचें कौन है इसमें

शायद रावण को मति आ गयी

सीता को भेजा है उसने।


सुलोचना पास आयीं राम के

बहुत तरह स्तुति की उनकी

 विभीषण बताएं ये राम को

पतोहू है ये रावण की।


विनती करे सुलोचना राम से

शीश पति का आपसे माँगूँ

आँखों में पानी राम के

कहें, तुम कहो तो इसे जिला दूँ।


कहे सुलोचना हे रघुवर जी 

आप उदार हैं, दे सकते सब 

प्राण पति के मैं न माँगूँ'

उनका उद्धार तो हो चुका अब। 


सुग्रीव को कह कर शीश दे दिया 

सुलोचना धूल पोंछे पति मुख से 

पाकर शीश कृतार्थ हुईं वो 

पर मुख मलिन था उनका दुःख से। 


संदेह हुआ सुग्रीव को कि 

हाथ अकेला कैसे लिखे सब 

कहें अगर ये मुख हंस देगा 

सारी बात मानूंगा मैं तब।


रामचंद्र बोले सुग्रीव से 

उचित नहीं कुतर्क ये करना 

सुलोचना विनती करे शीश से 

हंसो, लोग मानें ना वरना। 


शीश कुछ भी बोले न था 

सुलोचना कहे लाज रखो मेरी 

जोर से फिर हंस दिया था वो सिर 

जैसे युद्ध में बजे रणभेरी। 


आश्चर्यचकित हुए वानर सब 

शीश ने हंसना बंद कर दिया 

सुग्रीव सुलोचना की करें बड़ाई 

राम से पूछें, ये कैसे हुआ। 


राम कहें, पतिव्रता स्त्री उसकी 

प्रताप से उसके हुआ है ये सब 

सुलोचना विनती करें राम से 

एक दिन युद्ध को बंद करो अब। 


पालकी में रख कर वो सिर को 

ले आईं जगह एक सुँदर 

नदी, समुन्द्र का संगम जहाँ 

पालकी को रखा वहां पर। 


रावण, मंदोदरी भी आ गए 

चिता जहाँ पर वहां बनी थी 

चला गया मेघनाद स्वर्ग को 

सुलोचना भी साथ चलीं थीं। 


पुत्रवध से दुखी रावण था 

पल भर के लिए मूर्छा आई 

मंदोदरी विलाप करें वहां 

और स्त्रियां भी वहां आयीं। 


रावण दे ज्ञान स्त्रियों को 

कहे संसार का ये ही चरित्र 

खुद है बहुत नीच वो मन में 

बात करे शुभ और पवित्र। 


बहुत लोग हैं, जो दूसरों को 

उपदेश देते हैं ज्ञानी बन 

पर कुछ लोग ही होते हैं जो 

उनके अनुसार करें आचरण।


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