राखी प्रेम से बँधनी चाहिए
राखी प्रेम से बँधनी चाहिए
राखी प्रेम से बँधनी चाहिए,
दिखावे से नहीं, दिल से बँधनी चाहिए।
रिश्तों में अपनापन हो अगर,
तो हर दूरी मिटनी चाहिए।
न हो मन में कोई भेदभाव,
न शब्दों में कोई बनावट हो,
भाई-बहन के इस रिश्ते में,
बस सच्ची-सी चाहत हो।
हर बार बुलाने से रिश्ते,
कब तक आखिर निभाए जाएँ?
जब कदम हमेशा एक ही बढ़ें,
तो दूसरे कदम कहाँ से आएँ?
राखी कोई धागा भर नहीं,
यह विश्वास की पहचान है,
बहन के स्नेह में भाई का,
और भाई में बहन का मान है।
जहाँ प्रेम हो, वहाँ जाना है,
जहाँ सम्मान हो, वहाँ ठहरना है,
पर एकतरफा औपचारिक रिश्तों को,
हर बार क्यों हमें ही भरना है?
राखी प्रेम से बँधनी चाहिए,
मन से मन की कड़ी होनी चाहिए,
न मजबूरी, न दिखावा कोई—
बस रिश्ते में सच्चाई होनी चाहिए।
अगर दिल में स्नेह बचा हो,
तो दूरी भी कम हो जाती है,
और जहाँ अपनापन मर जाए,
वहाँ राखी भी बस रस्म बन जाती है
