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AVINASH KUMAR

Abstract Romance

4  

AVINASH KUMAR

Abstract Romance

रात की पलकें

रात की पलकें

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4

रात की पलकें रात की पलकें देख रही हैं,
जुगनू आँखें खोल रहे हैं,
लेकिन है उजियारे जैसा,
भोर के पंछी बोल रहे हैं।
सोई है जब सारी दुनिया,
फिर आँखों में जागा कौन?

हम तुम में से कृष्ण कौन है,
हम तुम में से राधा कौन?
चाँद ठहरकर देख रहा है,
तारों ने चुप्पी साधी है,
हवा किसी के नाम की जैसे,
धीरे-धीरे बात कहती है।
 नींद भरी इन राहों पर भी,
पदचाप कोई आती है,

 बंद पड़ी इन आँखों में फिर,
किसकी छवि मुस्काती है?
शायद तुम हो, शायद मैं हूँ,
शायद दोनों का एहसास,
शायद कोई प्रेम पुराना,

बनकर आया आज की साँस।
बिन बोले जो बात समझ ले,
वही तो सच्चा प्रेम है,
दूर रहकर भी पास जो रखे,
वही हृदय का नेम है।

यमुना जैसी शांत रात में,
मन की लहरें उठती हैं,
बाँसुरी की कोई धुन जैसे,
दूर कहीं से सुनती हैं।
कदंब तले कोई खड़ा है,
या मन का ही कोई स्वप्न?

किसके आने की आहट से,
जाग उठा है मेरा मन?
 राधा पूछे चाँद से जाकर,
 कृष्ण कहाँ हैं आज?

चाँद कहे—वह पास ही बैठे,
बनकर तुम्हारी साँस।
कृष्ण कहे—राधा तो मेरे,
मन के भीतर रहती है,
नाम भले दो हों इस जग में,
 धड़कन एक ही कहती है।
प्रेम अगर पूजा बन जाए,
मन मंदिर हो जाए,

एक-दूसरे में खुद को पाकर,
हर दूरी मिट जाए।
न कोई दावा, न अधिकार हो,
 न कोई मन में प्रश्न,
बस समर्पण की उस राह में,
मिल जाए जीवन का अर्थ।

रात ढलेगी, सूरज निकलेगा,
फिर जग अपनी राह चलेगा,
फिर भी इन दो जागी आँखों में,
प्रेम सदा यूँ ही जलेगा।
जुगनू बनकर यादें चमकें,
चाँद बने विश्वास,

तुम राधा बनकर मुस्काना,
मैं बन जाऊँ कृष्ण की आस।
जब दुनिया हमको पूछेगी—
“तुम दोनों का रिश्ता कौन?”
हम मुस्काकर इतना कह देंगे—
 “तुम ही कृष्ण और मैं ही राधा,

 या मैं कृष्ण और तुम राधा—
प्रेम में आखिर भेद है कौन?”
रात की पलकें देख रही हैं,
जुगनू आँखें खोल रहे हैं,
दूर कहीं फिर भोर के पंछी,
 प्रेम के गीत ही बोल रहे हैं।

सोई है जब सारी दुनिया,
हम दोनों में जागा कौन?
हम तुम में से कृष्ण कौन है,
 हम तुम में से राधा कौन?


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