अकेले चलने का हुनर
अकेले चलने का हुनर
अकेले चलने का हुनर
जिसको जितनी दुनिया समझ आती जाएगी,
वो उतना ही खुद में उतरता जाएगा।
भीड़ के शोर से दूर होकर,
मन की आवाज़ सुनता जाएगा।
हर चेहरा अपना हो, यह ज़रूरी तो नहीं,
हर रिश्ता सच्चा हो, यह भी ज़रूरी तो नहीं।
कुछ लोग साथ होकर भी दूर रहते हैं,
कुछ दूर होकर भी दिल में रहते हैं।
जब उम्मीदें लोगों से टूटने लगती हैं,
तब मुलाकात खुद से होने लगती है।
खामोशी फिर दोस्त बन जाती है,
और तन्हाई बहुत कुछ सिखाती है।
अब किसी के आने का इंतज़ार नहीं,
न किसी के जाने का मलाल है।
जो मिला, उसे स्वीकार कर लिया,
जो गया, उसे भी खुशहाल रहने दिया।
**अकेला हूँ तो कमजोर नहीं,
बस अब खुद को समझने लगा हूँ।
दुनिया चाहे जितना समझे मुझे,
मैं खुद में पूरा होने लगा हूँ।**
