कुछ लोग खुद को ज़मीं और आसमाँ समझने लगे है
कुछ लोग खुद को ज़मीं और आसमाँ समझने लगे है
कुछ लोग खुद को ज़मीं और आसमाँ समझने लगे हैं,
नादान हैं, न जाने खुद को क्या समझने लगे हैं।
दो पल की है ज़िंदगी, दो पल का है ये मेला,
फिर क्यों खुद को दुनिया का ख़ुदा समझने लगे हैं।
जिनके कदमों में कल तक थी राहों की धूल भी,
आज वही खुद को सबसे बड़ा समझने लगे हैं।
वक़्त की करवट का इन्हें अंदाज़ा नहीं शायद,
आज ऊँचे हैं तो खुद को सदा समझने लगे हैं।
आईना दिखाए कोई तो नाराज़ हो जाते हैं,
अपने हर ऐब को भी अदा समझने लगे हैं।
भूल गए हैं कि मिट्टी से ही बने हैं हम सब,
फिर क्यों खुद को सबसे जुदा समझने लगे हैं।
झुकना जिसे आता है, वही ऊँचा रहता है,
ये बात भूलकर खुद को बड़ा समझने लगे हैं।
एक दिन यही ज़िंदगी हिसाब माँगेगी उनसे,
जो आज हर इंसान को क्या समझने लगे हैं।
ज़रा वक़्त को बोलने दो, सच सामने आएगा,
जो खुद को आसमाँ कहते हैं,ना जाने कल कहाँ मिलेंगे
