STORYMIRROR

Dr.Rashmi Khare"neer"

Abstract

3  

Dr.Rashmi Khare"neer"

Abstract

राह

राह

1 min
177

जब जीने का मकसद नजर ना आए

कोई कहीं भी नजर ना आए

हार कर कुछ ना कर ले कभी

मुझे ये भी सही लगने लगा


सतिप्रथा में बुरा क्या है

नहीं जीने कि ख्वाहिश ही कभी

बढ़ गई और कुछ नजर ना आए

तब मेरे दोनों बच्चे मुझे बहुत कुछ सिखाए

मेरे हमसफ़र बन गए


मैंने सीखा उनसे कैसे जीऊ

आ वो मुझे अपनी प्रेरणा बना लिए

मां से सब शुरू मां से ही सब खत्म

मां ईश्वर का वो रूप है

जो चाहता भी हमसे और देता भी सब हमी को


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract