प्रकृति और पुरुष
प्रकृति और पुरुष
सांख्य में पढ़ा था
प्रकृति पुरूष को रिझाती है
मचलती है इठलाती है
धर कर अनेक रूप
उसको बहलाती है
किन्तु वह
बनकर निर्मोही
बैठा रहता है
ध्यान मुद्रा में
अभिनय के गहन तिमिर में
चक्षु उसके बन्द हों
या हों अनावृत
नहीं देख पाता वह
या देखना नहीं चाहता !
प्रकृति का नर्तन,
और रिझाना उसका
आज मानो वही सांख्य
साक्षात् उपस्थित है
प्रकृति
आज पुनः श्रृंगार में रत है
कभी अपने नयनों में
श्यामल मेघमाला को
अंजन सा सजा रही है
कभी श्वेत कपास से बादलों का
हिंडोला बन इतरा रही है
वृक्षों की शाखाओं से
लेती है हिलोरें
पुष्पों के खिलने में
खुल कर मुस्कुरा रही है
पहुँचने को उस तक
बांध लेती है पैरों में
वर्षा की बूंदों के घुँघरू
गाने लगती है मेघ मल्हार
कोयल की कूक में
पंछियों की चहचहाहट में
भिगो देती है उस निष्ठुर का
सम्पूर्ण तन
किन्तु फिर भी
उसकी प्रेम-धारा
नहीं पहुँच पाती
उस हृदयहीन के भीतर
हार कहाँ मानने वाली है वह भी
हवाओं सी बहती है
और कस कर बाँध लेती है
उसे अपने अंक में
और कानों में धीमे से कहती है
खोलो अपने नेत्र
देखो
तुम्हारे लिए ही तो सजाया है मैंने
यह सारा रंगमंच
कि कर सकूँ तुम्हें प्रसन्न
कि तुम्हारे बिना अस्तित्व कहाँ है मेरा
तुम भी कहाँ पूर्ण हो
मेरे बिना
सांख्य की प्रकृति
बाँध पाती है कि नहीं
उस पुरुष को
प्रश्न ये नहीं है
प्रश्न ये है
आज सजी संवरी ये नायिका
बाँध पायी है तुम्हें
तुम! जो मनुष्य हो
तुम ही तो हो पुरूष
पुरूष अर्थात् आत्मा
पुरूष अर्थात् चैतन्य
प्रकृति आज झूम रही है
किस लिए??
मात्र तुम्हारे लिए
क्योंकि पता है उसे
तुम विश्राम में हो
ध्यान-तिमिर भग्न है अभी तुम्हारा
जानती है वह
कुछ ही समय पश्चात्
रत हो जाओगे तुम
जीवन की उसी ऊहापोह में
उसी तम में डूब जाओगे तुम
फिर से ।
तो उठो !
तोड़ो अपनी तन्द्रा
और सराहो उसके शृंगार को
जो उसने तुम्हारे लिए ही किया है
अपने उर से लगा लो उसे
हृदय के भीतर भर लो
प्रेम उसका
आकण्ठ डूब जाओ
उसके प्रेममद में
फिर देखना
तुम्हारे भीतर का मरुस्थल
किसी जल प्रपात सा
किसी स्रोतस्विनी सा
बह निकलेगा
बहुत ही मनोरम होगा यह दृश्य
प्रकृति और पुरुष के मिलन का ।।
