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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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प्रिय संघर्ष

प्रिय संघर्ष

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प्रिय संघर्ष 

संघर्ष और जीवन दोनों एक दूसरे पूरक होते हैं

कोई जीवन को संघर्ष तो कोई संघर्ष को ही जीवन कहते हैं

जीवन बिना संघर्ष के रिक्त पत्र हुआ करता है 

संघर्ष ही है जो जीवन को अलंकृत किया करता है 

नहीं था ज्ञान मुझे कई मार्गों का संघर्ष ने मार्गदर्शन किया है 

संघर्ष ने असफलता की अग्नि में डाल मुझे स्वर्ण तुल्य मूल्य दिया है 

तिनके उड़ जाया करते है तूफानों में तूफानी जीवन देकर पर्वत सम स्थिरता का गुण दिया है 

भ्रमित विचार कर दिया करते है विभिन्न विचारो की नदियां मुझमें संतुलित हो मुझे समुद्र किया है 

साधारण से असाधारण होने की यात्रा में संघर्ष के समुद्र को पार करना होता है 

दशरथ पुत्र राम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम होने के लिए संघर्ष का वरण करना पड़ता है

संघर्ष यज्ञ की अग्नि में आहुति व्यसनों की देनी होती है

व्यसनयुक्त व्यक्ति की कामना सिद्धि कभी नहीं करती है 

जीवन बिना संघर्ष के निष्प्राण हुआ करता है 

निष्प्राण वस्तु की कामना बताओ कौन करता है?

धारा के विपरीत होकर स्वयं को स्थापित करना होता है

सुभाष बाबू से नेता जी की यात्रा में सब कुछ त्यागना होता है

इतिहास भी संघर्ष में रहने वालों को ही जीवित बताया करता है 

बताओ जरा ब्रिटिश काल में संघर्ष रहित लोगों की गाथा कौन गाया करता है ।

संघर्ष जो स्वार्थ के लिए हो वो निम्नकोटी का हुआ करता है ।

जिस संघर्ष में मानवता हो उद्देश्य वही उच्चकोटी को प्राप्त करता है

संघर्ष न मिले जिस पथ पर उसका त्याग होना चाहिए

किसी भी परिस्थिति में संघर्ष में ही अनुराग होना चाहिए

स्वयं को स्वयं के मनसा संकल्प से कही भी देख सकते हो ।

उस संकल्प का आधार संघर्ष होगा तभी संकल्प को सशरीर कर सकते हो ।।

संघर्ष विहीन जीवन की मैं कामना नहीं करता हूं।

संघर्ष न हो तो मृत्यु की याचना करने से नहीं डरता हूं ।।



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