परिवर्तन
परिवर्तन
चाहे जितना उत्पात करूँ
मैं तेरा ही तो हूं भगवान।
पापी होकर भी तेरा ही हूं
और रहूँगा आजीवन।।
जग ने पापी कह ठुकराया
पर तुम कैसे ठुकराओगे ।
विश्वास मुझे है तुम मुझको
इस बार शीघ्र-अपनाओगे।
ढूंढा जग का कोना कोना
कोई भी मिला नहीं अपना।
जो कुछ अब तक था धोखा था,
माया था, सब कुछ सपना।
वह चहल-पहल जगती मुझको
लगती जैसे निर्जन कानन।
चाहे जितना उत्पात करूं मैं
तेरा ही तो हूं भगवान।।
अब तक सब ने बतलाया था
भ्रामक माया ही इस जग को।
फिर भी सुंदर,अपना, कहकर
अपनाया था मैंने इसको।
पर आज सत्य हो गया कथन
अंधे का, कबीरा, तुलसी का।
मन ने भी छोड़ दिया करना
हो कर निराश अपने जी का।
तेरी छवि से अब दीप्त मुझे है
दिख रहा जग का कण कण।
चाहे जितना उत्पात करूं
मैं तेरा ही तो हूं भगवान।।
रत्ना कार वाल्मीकि बनते,
ऐसी जग की है रीति रही।
मैं भी पाऊं निश्चय तुमको
यदि तुझ में वैसी प्रीति रही।
मानव मन बदला करता ही है
यह कहने की बात नहीं।
जग यह धोखे की भट्टी है
साथी देते हैं साथ नहीं।
सुख से या दुख से किसी
तरह सहना पड़ता यह परिवर्तन।
पापी होकर भी तेरा ही हूं
और रहूँगा -आजीवन।।
