परिवर्तन की अभिलाषा
परिवर्तन की अभिलाषा
अपनी काया स्वयं मिटाकर,
अंकुर पाने को।
चला बीज धरती के अंदर, स्वयं मिटाने को॥
सड़ा गला मिट्टी में नित नित,
पर बाहर निकला।
नयी कोपलें नव जीवन ले,
अम्बर में उछला॥
पल पल साथ चली कठिनाई,
पथ भटकाने को।
चला बीज धरती के अंदर, स्वयं मिटाने को॥
परिवर्तन की अभिलाषा में,
अविरल अडिग रहा।
आँधी वर्षा तूफानों सँग,
सर्दी धूप सहा॥
दृढ़ इच्छा के संकल्पों से,
शक्ति बढ़ाने को।
चला बीज धरती के अंदर, स्वयं मिटाने को॥
सिद्ध हुआ पुरुषार्थ एक दिन,
बनकर बलिहारी।
चमत्कार का क्षण भी आया,
बना वृक्ष भारी॥
नहीं असंभव कुछ जीवन में,
यही सिखाने को।
चला बीज धरती के अंदर, स्वयं मिटाने को॥
