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Sachhidanand Maurya

Abstract

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Sachhidanand Maurya

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परिवार ही तो है।

परिवार ही तो है।

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सिखाता है जो रिश्तों में बंधना और बांधना,

और रोजी रोटी की खातिर घर को त्यागना,

कभी अरि बनता कभी यार ही तो है,

परिवार ही तो है।


देता बाप का दुलार और मां की पुचकार,

देता सद्गुण यह और देता यह शिष्टाचार,

भाई बहन का तकरार ही तो है,

यह प्यार ही तो है।


पहली पाठशाला है पहला शिवाला है,

है पहला दूध यही पहला निवाला है,

पहला गुल यही पहला गुलशन,

यह बहार ही तो है।


विश्व में प्रचार है अपना परिवार है,

पूरा संसार ही ऐसा ही विचार है,

यही जीवन का सार है,

संस्कार ही तो है।


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