प्रीत का गुलाल
प्रीत का गुलाल
विदा हुआ शिशिर ऋतु,वसंत का करो नेह आलिंगन।
नये परिधान से सज गई धरा,फाल्गुन का करो अभिनंदन।
वसुंधरा की भर गई झोली,रंग बिरंग के पुष्पों से।
रंग लो तन मन प्रेम सुधा से,श्याम के अनूप रूपों से।
राग द्वेष की जलाओ होलिका,भेद नहीं हो सीने में।
धो कर मैल ह्रदय ओट से,प्रीत का लगा लो गुलाल।
रंगों का है पर्व निराला,रखना नहीं कोई मलाल।
दहन करो अहंकार की लाठी,टूटे फूटे व्यर्थ विकारों को।
मीठी बोली के पकवानों से,शुद्ध करो विचारों को।
हर गली वृंदावन ,मथुरा हो,बारूद से मत खेलो होली।
जीवन की बगिया में सजा दो,संत रंगी रंगोली।
बंदूक़ भरा हो रंगों से,स्नेह की पिचकारी हो।
मत फेंको कीच एक दूजे पर,रंग घोल हितकारी हो।
