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ritesh deo

Tragedy

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ritesh deo

Tragedy

प्रह्न

प्रह्न

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धीरे धीरे चुपके से एकदिन तुम्हारी जिंदगी से जाना है

पर ऐसे नही जैसे सब जाते

किसी बात पर नाराज होकर

किसी बात से दुखी होकर

किसी बात का गुस्सा दिखाकर

या जब तुम मुझसे नाराज हो जाओ

जब तुम मुझसे बहुत दुखी हो जाओ

जब तुम्हे मेरी बाते चुभने लगी हो

या जब हमदोनो को मालूम हो

हम एकदूसरे से नाराज क्यों है

हमारी नाराजगियो का कारण क्या है

हमारे बीच दूरियों की वजह क्या है

मैं कभी ऐसे नही जाना चाहती..

 मैं छोड़कर जाना चाहती हूँ एक प्रश्न

जो कौंधता रहे तुम्हारे दिमाग मे गाहे बगाहे

आखिर वजह क्या थी, गलती क्या थी

सबकुछ जब ठीक था, तो नाराजगी क्या हुई

मैं जाना चाहती हूँ हर उस बात का प्रश्न बनकर

जिसमें उत्तर की प्रतीक्षा कभी खत्म ही न हो

जिसका जवाब मेरे सिवा किसी के पास न हो

जिसमे प्रश्नों के अनगिनत प्रहार हो

मगर जवाब की कोई राह ही न हो

मैं भी जाना चाहती हूँ कुछ इसतरह खामोशी से

सुना है... किसी के चले जाने से कही ज्यादा

अधूरा कर जाते है वो प्रश्न जिनके उत्तर नही मिलते ।



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