परछाई है हाथ ना आए।
परछाई है हाथ ना आए।
अजब रीत है इस दुनिया की
आंखें अपनी स्वप्न पराए।
जिनको हमने अपना माना
अपने होकर वे काम न आए।
व्यर्थ डूबना नयन झील में
जो डूबा वह पार न पाए।
दिल के टुकड़े स्वयं समेटे।
वह परछाई है हाथ न आए।
तपता मरुथल गर्म दुपहरी।
छांह कहीं भी नजर न आए।
रहा भटकता मृग प्यासा ही
प्यास कही भी बुझ न पाए।
