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S N Sharma

Abstract Tragedy

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S N Sharma

Abstract Tragedy

परछाई है हाथ ना आए।

परछाई है हाथ ना आए।

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अजब रीत है इस दुनिया की

आंखें अपनी स्वप्न पराए।

जिनको हमने अपना माना

अपने होकर वे काम न आए।

व्यर्थ डूबना नयन झील में

जो डूबा वह पार न पाए।

दिल के टुकड़े स्वयं समेटे।

वह परछाई है हाथ न आए।

तपता मरुथल गर्म दुपहरी।

छांह कहीं भी नजर न आए।

रहा भटकता मृग प्यासा ही

प्यास कही भी बुझ न पाए।


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