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Garima Mishra

Abstract

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Garima Mishra

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प्राण

प्राण

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समर्पण के धागे में लिपटे 

कुछ रिश्तों के प्राण हैं 


वो ही पहला अक्षर मेरा

वो ही पूर्ण विराम है!! 


वो ही मेरा उगता सूरज

वो ही ढलती शाम है 


सांसों से जाना है मैंने

"मात-पिता" ही प्राण है 

उनके चरणों में ही बसता मेरा

हर तीर्थ, हर धाम है।


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