पंछी बन उड़ जाने दो
पंछी बन उड़ जाने दो
एक रोशनी का सागर है,
जो मुझमें कहीं समाया है,
हे आयी कितनी आँधियां
मन इनसे कहाँ घबराया है,
धूप बन खिल जाऊंगी,
मायूसियों की सिहरन में
मन की आशा के कुछ सपने
जीवन में सजाने दो,
पंछी बन उड़ जाने दो।
जीवन का एक लम्बा अरसा,
पीछे ना जाने कहाँ खो गया,
कोई अक्स नहीं सामने मगर,
चल हो गया, सो हो गया
कुछ आहटें है सुन्दर यादों की,
कुछ अवसर भी है, शेष अभी
इन लम्हों में अब मुझे
खुलकर जरा मुस्कुराने दो
पंछी बन उड़ जाने दो।
आज सुना मैंने मेरे मन का आईना
हर पल क्या गीत सुनाता है,
हो बात फिर कैसी भी,
समझाता है, बहलाता है,
कोई सीमा नहीं है तेरे लिए
कहकर मनोबल बढाता हैं,
अपने सपनों की खातिर
मुझे आशा के दीप जलाने दो
पंछी बन उड़ जाने दो।
