पलायन के दर्द
पलायन के दर्द
लौट कर चले आये वहाँ रह कर भी क्या करते
कोई अपना नही हो जहाँ
वहाँ मर कर भी क्या करते
लोग दूर से पूछते थे, कैसे हो भाई
थक गए अपना हाल समझाते, बता क्या करते
रास्ता, मंजिल तरीका सब पता था मगर
पता नहीं था दूरी इतनी हो जायेगी, भला क्या करते
सिवा हमारे दुनिया ही घर मे बैठी थी
दुखी थे सभी, हम दुख के अचार का क्या करते
जिंदगी छोटी सी है, इसलिए छोटे खाब देखे थे
पर रात ही इतनी लंबी हो गई, सोकर क्या करते
मुँह देखने को तरस गए अपनो का
मौत की सवारी भी मिली चढ़ लिए,सिवा क्या करते
माँ के आंसू, बहन की राखी, बीवी की चूड़ियां
कितना कुछ छुप गया आंसुओं में बहते, क्या करते
सोचते थे सुबह आएगी कोई, पर
दिलासे भी दिल से कहाँ लगते, बता ना क्या करते
लौट कर चले आये भला क्या करते।
