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प्रवीन शर्मा

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प्रवीन शर्मा

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अलविदा इक्कीस

अलविदा इक्कीस

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साल गुजरता अलविदा कर ही गया। 

यादों को उम्मीदों से जुदा कर ही गया। 


उम्मीदें उतर आई शाम के परिंदों सी, 

पर पुराना होकर भी कुछ नया सिखाकर ही गया।


जीने के कुछ और पैंतरे हासिल हुए इस साल

कोरोना में जितना रोना था रुलाकर ही गया।


कितनी है इक्कीस को 'किस' करने की वजहें

उतनी ही भुलाने की भी ये बता कर ही गया।


कहीं अपनो ने अपनो को मार दिया तो कहीं,

कोई सरहद का जवान सबको बचा कर ही गया।


कहीं तालिबान की सरकार बनी तो, 

कही सरकारें तालिबानी बना कर ही गया।


किसान और जवान छाए रहे हर क्षण,

बाकी सभी है दर्शक ये जता कर ही गया।


उधार पर जी रहे थे हम, और कर लिया हमने,

फिर भी कुछ अरबपति बढ़ाकर ही गया।


रोजी के लिए बच्चे उलझे, रोटी के लिए बुजुर्ग,

टीके के लिए तो घमासान कराकर ही गया।


अभी जिंदा हूं फिर क्या, खिलौने सा सही,

ये मेरी जीत है एहसास दिला कर ही गया।



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