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Chandragat bharti

Inspirational


5.0  

Chandragat bharti

Inspirational


पीर बहुत बढ़ जाती है

पीर बहुत बढ़ जाती है

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उन लम्हों की बात न छेड़ो

पीर बहुत बढ़ जाती है ।


भूल पुरानी बातें यारो

नये ख्वाब अब बुनता हूँ 

अन्तर्मन को छोड़ नेह की

बात नही अब सुनता हूँ 

याद तनिक जो आये उनकी

टीस उभर फिर आती है ।


जिन राहों में केवल पत्थर

उन राहों में जाना क्या

मतलब की इस दुनिया मे फिर 

गीत प्रेम के गाना क्या

बात पुरानी मगर कसम से

अन्दर अन्दर खाती है ।


छोड़ अकेला चला गया जो

उससे अब कुछ क्या कहना

शूल चुभाती रातों में अब

भोले सपने क्या बुनना

मगर सोच सब इन आँखो में

नाहक बदली छाती है ।


दिल के खालीपन को फिर भी

आज नही कल भर लूंगा 

उसके ऊपर आँच न आये

मुश्किल सारी हर लूंगा 

व्यथित जिन्दगी भले आज पर

गीत खुशी के गाती है ।


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