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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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पहचान

पहचान

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रौनक थे बस्ती की।

होती थी दो पल की लड़ाई भीI


अब बैर में तब्दील हो गई

वक्त की ठोकर क्या लगी,

वक्त की भाषा ही बदल गई।


नादानियां छली गई

उलझे-उलझे उसूलों की ओर खींची गई।

बेतरतीब खयालों से सींची गई

सवालों जवाबों में उलझा दी गई।


परिणाम मासूमियत भाप हो गई

जाने कब सुबह से शाम हो गई।

खेल ऐसा था जिसमें षड्यंत्र

का ही बीज रोपा था।


बिन खेले ही जैसे शाम हो गई

छलते-छलते आखिर रात हो गई।

हाथों की लकीरों की पहचान खो गई।


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