STORYMIRROR

नंदन पंडित

Abstract Inspirational

4  

नंदन पंडित

Abstract Inspirational

पचते न पर बैन

पचते न पर बैन

1 min
286

समय सिरफिरा

बड़ा भेदिया

रखना गुह्य सम्हाल

 

कान बढ़ाकर

सूँघ ही लेतीं

दीवारें जज्बात

नाकों तक

ले ही आता है

दुर्गंधों को वात

 

सभी उजागर

कर देता है

स्वतः मुखर हो राज

कभी-कभी को

हो जाता है

मौन बड़ा वाचाल

 

 

पैरा का कर पाँव

दौड़ता

शब्द सदा दिन रैन

पच जाता है

कंकड़-पत्थर

पचते न पर बैन

 

आँसू पी- पी

बन बैठा है

पर्वत हिमाधिराज

बहती सरिताएँ

कह देती हैं

खुद सारा हाल

 

 

कई जनों के

डसने से भी

आती नहीं लहर

मुँह से बाहर

कर देता पर

दुपहर सभी जहर

 

आँखें दर्पण

होती हैं सच

का प्रतिबिंब दिखातीं

रख देती हैं

उद्गारों को

गालों पर तत्काल।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract