पौराणिक आख्यान!
पौराणिक आख्यान!
देते हैं सब एक सा ज्ञान,
मिलता है सबको सम्मान।
मिलते अभी भी हैं वे निशान,
पढ़ लो पौराणिक आख्यान।।
राम अभी भी हैं हर घर में,
रावण फैले हैं कण - कण में।
नारी घिरी लक्ष्मण रेखा में,
सीता खड़ी अभी दुविधा में।।
असुर लंकपति एक ही तो थे,
अब तो घर- घर लंका है।
घोर पाप हिंसक कृत्यों के,
बजता अब भी डंका हैं।।
भौतिकता का नृत्य हो रहा,
मानवता अब रोती है।
भ्रष्टाचार छलांग भर रहा,
अबला नारी रोती है।।
जिनके पास है धन और दौलत,
मिली है जिनको जितनी शोहरत।
ठिठक खड़ी है जन पंचायत,
सुख समृद्धि की रह गई हसरत।।
छंटेगा क्या ये दुख का बादल,
सुख हर घर पहुंचेगा दल - बल।
हक़ पाएं जीने का निर्बल,
निर्मल होगा क्या गंगाजल।।
रामराज्य क्या फ़िर आएगा,
मनु समाज क्या इतराएगा।
घिरा अंधेरा छंट जाएगा,
सकल विश्व क्या मुस्कुराएगा।।
