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SARVESH KUMAR MARUT

Classics Abstract

4.6  

SARVESH KUMAR MARUT

Classics Abstract

ओ !गौरैया-ओ !गौरैया

ओ !गौरैया-ओ !गौरैया

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ओ ! गौरैया-ओ ! गौरैया,

कत्थई मेरी फुदक चिरैया।

            कहाँ गयीं तुम कहाँ गयीं ?

            आओ न मेरी प्यारी चिरैया।

समय बहुत व्यतीत हुआ,

जब घर आँगन पर आती थीं।

            दाना चुंगकर औ पानी पी,

            तुम तन को तृप्त कराती थी।

चीं-चीं, फ़ुदक-फ़ुदक कर

आँखों को हरियाती थी।

            हम मानव ने वास है छीना,

            घरों में भी न जगह मिली।

कहाँ-कहाँ तू भटकी होगी ?

मिला न होगा तुझे निलय।

            नील गगन भी नापा होगा,

            सात समन्दर छाना होगा।

जहाँ गयीं तुम जहाँ गयीं,

न भूख़ मिटी न प्यास मिटी।

            साँस रही तब तक बेचारी,

            निराश्रय यहाँ-वहाँ भटकी होगी।

सिकोड़े पंख-सी बैठ गयी अब,

अब नहीं दिखुंगी मैं लुप्त हुईं।।


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