नये अखबार में पुरानी खबर
नये अखबार में पुरानी खबर
सुर्खियों से अखबार नहीं बनता
खबर से अखबार बनता है
खबरों का होता है गहरा असर
लोगों की होती है इसपर नजर
लेखों का मजमा लग जाता है
एडिटर एडिट कर देता है
फिर अखबारवाला सुबह सुबह निकल पड़ता है
रोज नये अखबार में पुरानी खबरें छोड़ जाता है
रेप, दुर्घटना, चोरी, भ्रष्टाचार, आंदोलन, दफ्तर
नौकरियां, खेल, इंटरटेनमेंट और मर्डर
इन सब का मेल अब पूरे दिन चलेगा यही खेल
किसकी सत्ता घिसकी किसकी सत्ता बन गई
अपने को क्या अपनी जेब तो फिर से कट गई
लाकडाउन से करोड़ों के करीब नौकरियां गई
महंगाई तो हमारी कमर तोड़ गई
हमारी बेटी फिर से खेत में रौंदी गई
कृषकों की भी सरकार से ठन गई
सत्ता घिसकी या घिसका दी गई
चलिए फिर से सूरज गया और चांद आ आई।
