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Ratna Kaul Bhardwaj

Abstract

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Ratna Kaul Bhardwaj

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नया ज़माना

नया ज़माना

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गर गुलिस्तां गुलों से गुलज़ार है

इंसान इस समां से क्यों बेज़ार है


कैद है दीवारों में खामोशियाँ

बेजान इमारतें खुशियों में शुमार है


आफताब तू ज़रा छुप जा बादलों में

पसीने की मुश्क हवा में भरमार है


दफ़न हैं ख्वाहिशें ज़िंदा लाशों में

तन्हाइयों में मिलता अब करार है


सफ़हे खुली किताबों के फड़फड़ा रहे

मरे ज़मीरों का अब बिछा मज़ार है


ए वक़्त तू तो कभी थमता नही

थमी सी क्यों लगे तेरी रफ्तार है


न बची कोई उम्मीद रिश्ते नातों से

न जाने यह दिल फिर क्यों बेकरार है.....


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