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S N Sharma

Abstract

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S N Sharma

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नसीब

नसीब

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करीब है जो बहुत भावना

उनकी ही हम समझ न सके।

कि जैसे पास आंख के ला के

किताब मुश्किल है पढ़ना ।

दुखा के दिल उनका उन्ही के

आगोश में हम   रहे बैठे।

यही अंदाजे सितम उनके

दिल का ताउम्र को नासूर बना

धूप और छांव जिंदगी की

दो रंगों से तस्वीर बनी कुछ ऐसी

अश्कों में घुले गमों के रंग 

खुशी को सियाह रहे हैं बना।

बहुत मसरूफ है टहनी पे

गौरैया किसी की उम्मीदो की।

जोड़ के तिनका तिनका

आंधियों में में घोंसला रही है बना

गर्चे आवाद हो ये नशेमन

बहार आएं तो गुलशन महके। 

तारे खुशियों के भरें दामन में

तो जागे कभी नसीब अपना।


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