Shivam Antapuriya
Tragedy
ख्वाब हैवान थे या नशेवान थे
जिन्दगी के सबब से परेशान थे
देखकर हाल उनका तो ऐसा लगे
वो तो इंसानियत के शैतान थे।
आपदाओं का सै...
परिंदा
अम्बार
"अपना कहके"
"मुझसे जले"
"आपदाओं का सै...
प्रेम नहीं पह...
लाचार किसान
तुम्हारी यादो...
रक्षा का बंधन
क्यों कहें निज हस्त खुद को, मौत मुंह में टाँगते हैं ? क्यों कहें निज हस्त खुद को, मौत मुंह में टाँगते हैं ?
मैं तेरी-मेरी बातों के, अल्फ़ाज़ ही वापस लेती हूँ। थक आज गयी हूँ मैं इतना, कि थकान भी वापस लेती हूँ... मैं तेरी-मेरी बातों के, अल्फ़ाज़ ही वापस लेती हूँ। थक आज गयी हूँ मैं इतना, कि थ...
कुछ टूट रहा था, कुछ छूट रहा था, लेखन से नाता टूट रहा था। कुछ टूट रहा था, कुछ छूट रहा था, लेखन से नाता टूट रहा था।
आज फिर एक माँ, आस के दीप जलाये गुमनाम हो गई। आज फिर एक माँ, आस के दीप जलाये गुमनाम हो गई।
ना करो तुम हमको ऐसे रुखसत यूँ अपनी इन भीगी पलकों से। देखना फिर नया ख्वाब बनकर आएंगे एक ना करो तुम हमको ऐसे रुखसत यूँ अपनी इन भीगी पलकों से। देखना फिर नया ख्वाब बनकर...
तड़पने वाले को उसके हाल पर छोड़कर निकल जाता हूँ मैं कुछ रूह का हिस्सा दफना कर आ जाता हू तड़पने वाले को उसके हाल पर छोड़कर निकल जाता हूँ मैं कुछ रूह का हिस्सा दफना कर ...
सात दिनों के सात रंग में रंगी हुई इसकी प्रेम कहानी है। सात दिनों के सात रंग में रंगी हुई इसकी प्रेम कहानी है।
धिक्कारेगा तुम्हें ये कड़वा सच जिसे कहने से तुम डरते हो। धिक्कारेगा तुम्हें ये कड़वा सच जिसे कहने से तुम डरते हो।
अब स्वतंत्र है वो तो पराश्रित मैं भी नहीं इस अर्थहीन पानी का अर्थ कुछ भी नहीं। अब स्वतंत्र है वो तो पराश्रित मैं भी नहीं इस अर्थहीन पानी का अर्थ कुछ भी नहीं...
दूर कहीं दिख रहा था एक अस्थि पिंजर, जिस पर रह गया था बस मॉंस चिपक कर। दूर कहीं दिख रहा था एक अस्थि पिंजर, जिस पर रह गया था बस मॉंस चिपक कर।
हां दर्द दिल में उठता है..कैसे कह देते हो तुम फिर भी मैं पराई हूं। हां दर्द दिल में उठता है..कैसे कह देते हो तुम फिर भी मैं पराई हूं।
कहाँ बने उनके लिए कभी कोई अलग से 'कृपा भवन।' कहाँ बने उनके लिए कभी कोई अलग से 'कृपा भवन।'
उसकी देह पर दो फटे पुराने कपड़े थे हाथ में एक रोटी का टुकड़ा..। उसकी देह पर दो फटे पुराने कपड़े थे हाथ में एक रोटी का टुकड़ा..।
मेरे हिंदू मुस्लिम बच्चों को आपस में लड़ाया जाता है मेरे हिंदू मुस्लिम बच्चों को आपस में लड़ाया जाता है
जब जाती हूं थक... तो निकल जाती हूं घर से बाहर। जब जाती हूं थक... तो निकल जाती हूं घर से बाहर।
खेतों से गांवों से कस्बों से शहरों से जैसे बसंत गायब खेतों से गांवों से कस्बों से शहरों से जैसे बसंत गायब
कौन जाने किस किस कोख़ से, जन्म कुपुत्र का होता है। कौन जाने किस किस कोख़ से, जन्म कुपुत्र का होता है।
बस एक अजीब सी ख़ामोशी है यहाँ, एक ठहरा हुआ समय हो जैसे। बस एक अजीब सी ख़ामोशी है यहाँ, एक ठहरा हुआ समय हो जैसे।
एक वक़्त था यारों जो लगे थे कतारों में। आज मिलने के लिए वह वक़्त दे रहे हैं एक वक़्त था यारों जो लगे थे कतारों में। आज मिलने के लिए वह वक़्त दे रहे हैं
आखिर क्यों लाखों परिवार न्याय से वंचित रह जाते है। आखिर क्यों लाखों परिवार न्याय से वंचित रह जाते है।