नन्हीं लड़कियाँ
नन्हीं लड़कियाँ
वो एक नन्ही सी लड़की
जिसके सपनों की उड़ान ऊंची है
पर कटे हुए हैं उसके पर
जड़ा हुआ है पाश
उसकी सम्भावनाओं पर
अपने बन्द दरवाजों से जूझती
झांकती विस्तृत आकाश
हो जाती है नम उसकी आँखें
सहम जाता है अंतर्मन
आगे अंधेरा है
घोर अंधेरा
काला स्याह अंधेरा
उसके सपनों पर कालिख़ पोतता अंधेरा
पर वो बढ़ाएगी क़दम
कब ,कैसे ,कहाँ
उसे नहीं पता
उसे बस इतना पता है
कि उसने निकाल फेंकी हैं जंज़ीरें
जिसने थामा था उसकी पदचाप को
और फेंक दिए हैं अपने मन के क़दम
बाहर की ओर
एक नहीं
दो नहीं
कितने क़दम
ये क़दम चीरेंगे अंधेरा
और मिटायेंगे अंधेरा
और वो देखेगी
एक झक सफेद चमकीला रास्ता
उसके पीछे पीछे दौड़ आएंगी
ऐसी ही ढ़ेर ढ़ेर बंधी
नन्ही लड़कियाँ।
