STORYMIRROR

नीरस भोर

नीरस भोर

1 min
796



भोर के सितांचल पर

झीने बादल छा गए

अश्रु जल का क्षार पी कर

स्वप्न कुछ ओंधे पड़े

तिमीर विष को छांटकर ना

स्नेह का रस उभरे

ताप उर संताप जर्जर

अरविन्द तट पर विषमता के

गोल से खंजन पड़े

भर कटोरी प्रीत की

पिबत गुज़री रात भर

नैंन सुख कटे नींदागोश में

पाजेब लय सी भोर दीसे

दीप सा शृंगार मेरा

सुधि तुम्हारी हर चला

एक व्योम सा मुझे छूके गुज़रा

निशीथ पुरी मुझे लिपटे

सुबह स्वप्न बाग सूना पड़ा

थे सुगंधित रात के कण

दिन को सब बेसुध पड़े।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance