नई माँ
नई माँ
माथे पर हो बड़ी सी बिंदी
काँच की चूड़ी से कलाई भरी
माँ इस छवि में कैद रही
बरसों से कुछ ऐसी ही।
पसीना पोंछती आँचल से
हाथों में आटा लिपटा
चूल्हे पर वह रोटी सेंकती
चेहरा लाल आग से दमका।
पूरे परिवार को खाना खिला
बचा खुचा वह कुछ खाती
अतिथि अचानक घर आ जाए
उस दिन वह भूखी सो जाती।
आज की नारी ने उस छवि से
माँ को है आज़ाद किया
नए कलेवे में लपेट कर उसको
दुनिया के सामने पेश किया।
जब से नारी ने शिक्षा पाई
अपनी इक नई पहचान बनाई
घर और कार्य क्षेत्र में संतुलन रख
दोनों जगह प्रतिष्ठा पाई।
बंदिश परिधान पर कोई नहीं
वह नित नव रूप में रहती है
साड़ी, जीन्स, स्कर्ट पहनती
आत्मविश्वास से खिलती है।
दया, क्षमा की मूर्ति माँ ने
कुछ नए आयाम आजमाए हैं
बहादुरी अनेक क्षेत्रों में दिखा कर
पायलट, कमांडो खिताब पाए हैं।
माँ के इस नए रूप को देख
समाज ने अब स्वीकारा है
बिन आँचल भी उसके मन में
बहती ममता की धारा है।।
